नेहरू खानदान की असलियत जान कर....
माननीय दिव्याजी!
नेहरू खानदान की असलियत आप के ब्लॉग पर पढी!...कोमेंट लिखने के लिए कोई प्रबंध नहीं पाया गया...इसी वजह से आपकी पोस्ट यहाँ दे रही हूँ...अगर आपको कोई एतराज हो तो बताएं...मैं तुरंत इसे डिलीट कर दूंगी!
...यहाँ दी गई जानकारी या खोजबीन श्री दिनेशचन्द्र मिश्राजी की है और वे अपने ब्लॉग पर इसे क्रमश: प्रस्तुत कर रहे है...मतलब कि आपने उनकी पोस्ट अपने ब्लॉग पर दी है....जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है!
.....खोज बीन में यही पता चला है कि नेहरू खानदान हिन्दू और मुसलमान...दोनों धर्मों का मिलन है !...यहाँ नेहरू के सौतेले भाई शेख अब्दुल्ला का उल्लेख नहीं हुआ है!...जो जवाहरलाल नेहरू के पिता...मोतीलाल नेहरू की दूसरी मुस्लिम पत्नी की कोख से जन्मे बेटे थे!उन्होंने मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था! ....यह खोज भी जगजाहिर हो चुकी है!...लेकिन नेहरू परिवार किसी अपराधिक मामले में फंसा हुआ कभी पाया नहीं गया!
....आपने इस पोस्ट में नेहरू परिवार की बहुत सी अन्य गोपनीय बातों पर से भी पर्दा उठाया है....लेकिन क्या इससे नेहरू-गांधी परिवार के बारे में जो जनता की सोच है....उसमें फर्क आ सकता है?
.....हाँ! वर्त्तमान राजनीति में यह परिवार,सत्ता की मजबूत बागडोर हाथ में होते हुए भी....जनता के हित के लिए कुछ नहीं कर रहा और आश्वासनों के सिवाय कुछ नहीं दे रहा ....यही सत्य हकीकत है!...इसी मुद्दे को ले कर जनता इस परिवार से मुंह मोड़ ले ....यही हो सकता है!
आपके पोस्ट की लिंक मैं यहाँ दे रही हूँ....http://zealzen.blogspot.in/2012/02/blog-post_29.html
....अति महत्वपूर्ण जानकारी...आभार!
-अरुणा कपूर.
बात छोटीसी होती है...उसका बतंगड बना कर उसे बडी बनाई जा सकती है।...जैसे कि गुब्बारा...और राई का पहाड!
Tuesday, 28 February 2012
Monday, 20 February 2012
सन-ग्लासेस पहनिएँ...स्टाइलिश नजर आइएं,व्यक्तित्व निखारिएँ...
सन-ग्लासेस् पहनिएँ...स्टाइलिश नजर आइएं, व्यक्तित्व निखारिएँ....
सन-ग्लासेस से मै बचपन से ही आकर्षित हूँ....बचपन में दादा-दादी के साथ मै गुजरात के जादर के मेले में घुमने जाया करती थी तब...बैलून या गुड्डा-गुडिया बेचने वालों के पास बाद में जाती थी; सब से पहले तो रंग-बिरंगी चश्में ले कर बैठे हुए दुकानदार के पास ही भाग कर पहुँच जाती थी...वहांसे तीन-चार सुन्दर से रंग-बिरंगी चश्में खरीदने के बाद ही दूसरी चीजों पर मेरी नजर ठहरती थी!...
खैर! बचपन बीत गया और उम्र के पचपन का पड़ाव भी मैंने पार कर लिया...लेकिन सन-ग्लासेस अब भी मुझे आकर्षित करते है!...जब मै सन-ग्लासेस पहन कर किसी पार्टी में जाती हूँ या बाजार में शोपिंग करने जाती हूँ...तब मेरी स्टाइल और व्यक्तित्व में निखार इन्ही की वजह से आता है!....क्यों कि मै अपने आप में एक अलग तरह का कॉन्फिडेन्स महसूस करती हूँ!....प्रोफाइल में मेरी फोटो देख सकते है!...
....जब मेरी नजर Ray-Ban RB 2140 पर पडी ( ऊपर फोटो देखिएँ)...
....तो लगा कि यह सन-ग्लासेस मेरे लिए अनुकूल है!...इससे मेरे स्टाइल में ज्यादा बढोतरी हो सकती है!...जाहिर है कॉन्फिडेन्स में भी और ज्यादा बढोतरी हो सकती है!....तो यह मेरी पसंद पर खरे उतरने वाले सन-ग्लासेस है!
Wow!…..मुझे यह सन-ग्लासेस भी पसंद
आए है....यह ब्राउन शेड लिए हुए है...और इनका फ्रेम भी मेरे चेहरे के अनुकूल है!...यह शायद लाइट वेटेड है!....इन्हें पहन कर बहुत बढ़िया और स्टाइलिश लुक मुझे मिल सकता है! व्यक्तित्व में और निखार आ सकता है और कॉन्फिडेन्स में और ज्यादा बढोतरी हो सकती है!.... इनकी पहचान भी मै यहाँ दे रही हूँ.....
यह है ......Ray-Ban RB 8301.....
वाह क्या बात है!.....मेरी पसंद के तो यह दो स्टाइलिश सन-ग्लासेस है!....वैसे मै तो सभी से कहूंगी के अपनी अपनी पसंद के सन-ग्लासेस को जल्दी जल्दी अपने कब्जे में कीजिए....देर किस बात की? ....Go for 'My Sunglasses, My Style'
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सन-ग्लासेस से मै बचपन से ही आकर्षित हूँ....बचपन में दादा-दादी के साथ मै गुजरात के जादर के मेले में घुमने जाया करती थी तब...बैलून या गुड्डा-गुडिया बेचने वालों के पास बाद में जाती थी; सब से पहले तो रंग-बिरंगी चश्में ले कर बैठे हुए दुकानदार के पास ही भाग कर पहुँच जाती थी...वहांसे तीन-चार सुन्दर से रंग-बिरंगी चश्में खरीदने के बाद ही दूसरी चीजों पर मेरी नजर ठहरती थी!...
....जब मेरी नजर Ray-Ban RB 2140 पर पडी ( ऊपर फोटो देखिएँ)...
....तो लगा कि यह सन-ग्लासेस मेरे लिए अनुकूल है!...इससे मेरे स्टाइल में ज्यादा बढोतरी हो सकती है!...जाहिर है कॉन्फिडेन्स में भी और ज्यादा बढोतरी हो सकती है!....तो यह मेरी पसंद पर खरे उतरने वाले सन-ग्लासेस है!
Wow!…..मुझे यह सन-ग्लासेस भी पसंद
यह है ......Ray-Ban RB 8301.....
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Friday, 10 February 2012
मेरी पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है...फ्लिपकार्ट वेबसाइट पर!
मेरी पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है... फ्लिपकार्ट वेबसाइट पर!
....अभी अभी मुझे हिन्दयुग्म के संपादक श्री। शैलेश भारतवासी की तरफ से यह शुभ-सन्देश प्राप्त हुआ है!
...धन्यवाद शैलेश जी!
...मै उन सभी का यहाँ फिर से धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने मेरे उपन्यास ' उनकी नजर है...हम पर !' की समीक्षा,प्रशंसा एवं आलोचना भी की है!...इस उपन्यास को मंगवाने के मेरे ई- मेल पर कई मैसेज भी आए और मैंने उन्हें श्री.शैलेश जी से संपर्क करने के लिए कहा था!
शैलेश जी लिखते है....
आदरणीया अरुणा जी,
यह बताते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आपकी पुस्तक, किताबों को ऑनलाइन बेचने वाली कंपनी प्लिपकार्ट की वेबसाइट पर विक्रय के लिए उपलब्ध करा दी गयी हैं। यह वेबसाइट किताबों को क्रेता तक 3-4 दिनों में पहुँचा भी देती है।
आपकी पुस्तक का flipkart लिंक-
उनकी नजर है हम पर- http://www.flipkart.com/books/8191038528?_l=b3JUm9Vsc9d2jQzOHTXUhw--&_r=q0z9FKSAm15_zCGhZRG0TA--&ref=a39c3bbc-1256-437a-90c2-c366175e7b24
प्लिपकार्ट पर आपके नाम का पेज- http://www.flipkart.com/author/aruna-kapoor
हिंद-युग्म की सभी किताबों का संक्षिप्त विवरण- http://www.flipkart.com/search-books/hind+yugm
आप इन लिंकों को अपने प्रसंशकों को भेजकर उन्हें यह सूचित कर सकते हैं कि यदि वे इस पुस्तक को भारत में कहीं भी मँगाना चाहें तो मँगा सकते हैं। अब उन्हें इसके लिए किसी पुस्तक बेचने वाली दुकान तक जाने की जरूरत नहीं है।
आप अपने फ्लिपकार्ट पेज को फेसबुक पर भी शेयर कर सकती हैं। इन लिंकों को अपने ब्लॉग पर लगा सकती हैं।
धन्यवाद।
निवेदक-शैलेश भारतवासी
....अभी अभी मुझे हिन्दयुग्म के संपादक श्री। शैलेश भारतवासी की तरफ से यह शुभ-सन्देश प्राप्त हुआ है!
...धन्यवाद शैलेश जी!
...मै उन सभी का यहाँ फिर से धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने मेरे उपन्यास ' उनकी नजर है...हम पर !' की समीक्षा,प्रशंसा एवं आलोचना भी की है!...इस उपन्यास को मंगवाने के मेरे ई- मेल पर कई मैसेज भी आए और मैंने उन्हें श्री.शैलेश जी से संपर्क करने के लिए कहा था!
शैलेश जी लिखते है....
आदरणीया अरुणा जी,
यह बताते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आपकी पुस्तक, किताबों को ऑनलाइन बेचने वाली कंपनी प्लिपकार्ट की वेबसाइट पर विक्रय के लिए उपलब्ध करा दी गयी हैं। यह वेबसाइट किताबों को क्रेता तक 3-4 दिनों में पहुँचा भी देती है।
आपकी पुस्तक का flipkart लिंक-
उनकी नजर है हम पर- http://www.flipkart.com/books/8191038528?_l=b3JUm9Vsc9d2jQzOHTXUhw--&_r=q0z9FKSAm15_zCGhZRG0TA--&ref=a39c3bbc-1256-437a-90c2-c366175e7b24
प्लिपकार्ट पर आपके नाम का पेज- http://www.flipkart.com/author/aruna-kapoor
हिंद-युग्म की सभी किताबों का संक्षिप्त विवरण- http://www.flipkart.com/search-books/hind+yugm
आप इन लिंकों को अपने प्रसंशकों को भेजकर उन्हें यह सूचित कर सकते हैं कि यदि वे इस पुस्तक को भारत में कहीं भी मँगाना चाहें तो मँगा सकते हैं। अब उन्हें इसके लिए किसी पुस्तक बेचने वाली दुकान तक जाने की जरूरत नहीं है।
आप अपने फ्लिपकार्ट पेज को फेसबुक पर भी शेयर कर सकती हैं। इन लिंकों को अपने ब्लॉग पर लगा सकती हैं।
धन्यवाद।
निवेदक-शैलेश भारतवासी
Saturday, 10 September 2011
हाय रे दोस्ती!...(व्यंग्य)
'दोस्ती ' टेम्पररी चीज होती है! ( व्यंग्य )
हमारी समझ में जो आया है वह यही है कि भैया! दोस्ती एक टेम्पररी चीज होती है !...
....अब आप फ़िल्मी कहानियों में उतर कर देखो तो दोस्त और दोस्ती को इतनी गहराई तक ले जाते है कि पूछो मत!...फ़िल्मी दोस्त और उनकी दोस्ती के कद को देखते हुए हम गैर फ़िल्मी लोग, अपने आप को बौनो की कैटेगरी में डालने के लिए मजबूर हो जाते है!...लगता है हम अपने दोस्त के लिए कुछ भी तो नहीं कर रहे ....कैसे मनुष्य है हम!...हम तो मनुष्य कहलवाने के भी लायक नहीं है!....और हमारा दोस्त भी यही सोचता है कि 'मै कितना स्वार्थी हूँ...मैंने तो दोस्ती के नाम को डुबो कर ...नहीं यार!...कलंकित करके रख दिया!'
...अरे फ़िल्मी कहानियों में तो एक दोस्त के लिए दूसरा दोस्त....अपनी प्रेमिका, कोठी, बंगलें, कारें और माँ-बाप तक को किनारे करने में देर नहीं लगाता!....जान तो बहुत ही सस्ती चीज होती है!....उसे भी दोस्ती के नाम कर दिया जाता है...लेकिन हम अपनी बात करें तो....हमारे लिए तो भैया यही सब चीजें प्रेमिका वगैरा वगैरा ...जी जान से प्यारी होती है!...दोस्ती के नाम हम इनमें से किसीका भी त्याग नहीं कर सकते!...दोस्ती के नाम पर हम बस! कभी कभार दोस्त के साथ चाय-पानी गटक सकते है,फिल्म देखने जा सकते है या फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते है!...कुछ यारदोस्त लोग कपडे या पैसे उधार लेते या देते है....लेकिन उधारी के चक्कर में जब चीज वापस करने की नौबत आती है तो दोस्ती के दूध का दही बनते देर नहीं लगती!
...याद आया! अपने महान बीग बी..अमिताभ बच्चन जी...और महान राजकीय हस्ती अमर सिंह जी भी दोस्ती की नौका में कुछ ही समय पहले सवार थे...अमर सिंह जी ने तो बच्चन जी को बड़े भाई का दरज्जा दे रखा था!..दोस्ती की धूम मची हुई थी!...जहाँ भी जाते थे ...साथ साथ जाते थे...अमर सिंह जी का मुंबई का एड्रेस...बच्चन जी का घर' जलसा' या 'प्रतीक्षा' था!...सभी को याद होगा कि अमर सिंह जी ने कुछ ही साल पहले बच्चन जी के बेटे को बर्थ डे गिफ्ट के तौर पर एक बहुत महंगी कार भी दी थी...भैया! इस बात का बवंडर उठना चाहिए तो नहीं था ...लेकिन उठा था!...अब कार तो कोई भी हो...महंगी तो होगी ही...लेकिन लोगो को कहने, बोलने,लिखने या फोटोएँ दिखाने से कौन रोक सकता है? ...दोस्त्ती को लोग समझे तो कुछ बात बने!....तो उस कार की इतनी एडवरटाइज हो गई कि पूछो मत!
...लेकिन समय ने पलटा खाया....ऐसा हुआ कि इन दोनों दिग्गजों की दोस्ती का बल्ब हमने टूटते हुए देखा...बहुत कुछ हुआ ! आखरी खबर के मुताबिक़ अमर सिंह जी दिल्ली की तिहाड जेल में पहुचाएं गए...वे बीमार भी थे ...उनके बहुत से करीबी उनसे मिलने तिहाड़ जेल पहुँच भी गए ...लेकिन ऊं हूँ!..बच्चन जी नहीं गए...अब दोस्ती के बारे में हम और क्या कह सकते है?
...और भी बहुतसी फ़िल्मी हस्तियाँ और राजनीतिज्ञों के बारे में ऐसा ही देखने और सुनने को मिला....जो समय की नजाकत पहचान कर कभी दोस्त तो कभी दुश्मन के किरदार में नजर आते है!....तब हम इस नतीजे पर पहुंचें कि आम आदमी भी गया- गुजरा नहीं है!....वह भी दिग्गजों वाली हैसियत रखता है!दोस्ती की कहानियाँ सिर्फ नाटक या फिल्मों की शोभा बढाने के लिए ही होती है!...बहुत सी अन्य चीज-वस्तुओं की तरह दोस्ती भी एक टेम्पररी चीज होती है!
हमारी समझ में जो आया है वह यही है कि भैया! दोस्ती एक टेम्पररी चीज होती है !...
....अब आप फ़िल्मी कहानियों में उतर कर देखो तो दोस्त और दोस्ती को इतनी गहराई तक ले जाते है कि पूछो मत!...फ़िल्मी दोस्त और उनकी दोस्ती के कद को देखते हुए हम गैर फ़िल्मी लोग, अपने आप को बौनो की कैटेगरी में डालने के लिए मजबूर हो जाते है!...लगता है हम अपने दोस्त के लिए कुछ भी तो नहीं कर रहे ....कैसे मनुष्य है हम!...हम तो मनुष्य कहलवाने के भी लायक नहीं है!....और हमारा दोस्त भी यही सोचता है कि 'मै कितना स्वार्थी हूँ...मैंने तो दोस्ती के नाम को डुबो कर ...नहीं यार!...कलंकित करके रख दिया!'
...अरे फ़िल्मी कहानियों में तो एक दोस्त के लिए दूसरा दोस्त....अपनी प्रेमिका, कोठी, बंगलें, कारें और माँ-बाप तक को किनारे करने में देर नहीं लगाता!....जान तो बहुत ही सस्ती चीज होती है!....उसे भी दोस्ती के नाम कर दिया जाता है...लेकिन हम अपनी बात करें तो....हमारे लिए तो भैया यही सब चीजें प्रेमिका वगैरा वगैरा ...जी जान से प्यारी होती है!...दोस्ती के नाम हम इनमें से किसीका भी त्याग नहीं कर सकते!...दोस्ती के नाम पर हम बस! कभी कभार दोस्त के साथ चाय-पानी गटक सकते है,फिल्म देखने जा सकते है या फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते है!...कुछ यारदोस्त लोग कपडे या पैसे उधार लेते या देते है....लेकिन उधारी के चक्कर में जब चीज वापस करने की नौबत आती है तो दोस्ती के दूध का दही बनते देर नहीं लगती!
...याद आया! अपने महान बीग बी..अमिताभ बच्चन जी...और महान राजकीय हस्ती अमर सिंह जी भी दोस्ती की नौका में कुछ ही समय पहले सवार थे...अमर सिंह जी ने तो बच्चन जी को बड़े भाई का दरज्जा दे रखा था!..दोस्ती की धूम मची हुई थी!...जहाँ भी जाते थे ...साथ साथ जाते थे...अमर सिंह जी का मुंबई का एड्रेस...बच्चन जी का घर' जलसा' या 'प्रतीक्षा' था!...सभी को याद होगा कि अमर सिंह जी ने कुछ ही साल पहले बच्चन जी के बेटे को बर्थ डे गिफ्ट के तौर पर एक बहुत महंगी कार भी दी थी...भैया! इस बात का बवंडर उठना चाहिए तो नहीं था ...लेकिन उठा था!...अब कार तो कोई भी हो...महंगी तो होगी ही...लेकिन लोगो को कहने, बोलने,लिखने या फोटोएँ दिखाने से कौन रोक सकता है? ...दोस्त्ती को लोग समझे तो कुछ बात बने!....तो उस कार की इतनी एडवरटाइज हो गई कि पूछो मत!
...लेकिन समय ने पलटा खाया....ऐसा हुआ कि इन दोनों दिग्गजों की दोस्ती का बल्ब हमने टूटते हुए देखा...बहुत कुछ हुआ ! आखरी खबर के मुताबिक़ अमर सिंह जी दिल्ली की तिहाड जेल में पहुचाएं गए...वे बीमार भी थे ...उनके बहुत से करीबी उनसे मिलने तिहाड़ जेल पहुँच भी गए ...लेकिन ऊं हूँ!..बच्चन जी नहीं गए...अब दोस्ती के बारे में हम और क्या कह सकते है?
...और भी बहुतसी फ़िल्मी हस्तियाँ और राजनीतिज्ञों के बारे में ऐसा ही देखने और सुनने को मिला....जो समय की नजाकत पहचान कर कभी दोस्त तो कभी दुश्मन के किरदार में नजर आते है!....तब हम इस नतीजे पर पहुंचें कि आम आदमी भी गया- गुजरा नहीं है!....वह भी दिग्गजों वाली हैसियत रखता है!दोस्ती की कहानियाँ सिर्फ नाटक या फिल्मों की शोभा बढाने के लिए ही होती है!...बहुत सी अन्य चीज-वस्तुओं की तरह दोस्ती भी एक टेम्पररी चीज होती है!
( फोटो गुग्गल से ली हुई है!)
Wednesday, 11 May 2011
राम को 'ओरामा!' और शाम को 'ओशामा'..क्यों न कहे?
ओसामा, ओबामा या सुदामा...
सभी में समाया 'आमा'!
...एक जगराते में..याने कि जागरण में...हमारा जाना हुआ!....जगराता 'माता' का था...लेकिन जैसे कि आप सभी जानते है, सिर्फ 'माता' का नाम या भजनों से काम नहीं चलता!...जगराते में शिवजी, कृष्ण कन्हैया, राधा, राम-लक्ष्मण-सीता और अनेक देवी-देवताओं को एंट्री दी जाती है!..अब तो श्री सत्य साईबाबा भी शामिल हो चुके है....लगता है आगामी कुछ सालों में महात्मा गांधी और अंबेडकर भी शिरकत करें!
...तो हम जागरण याने कि जगराते का आनंद लूट रहे थे!....एक के बाद एक देवी-देवताओं का आगमन होता रहा...जयजय-कार होती रही!...वातावरण भजनों के रस से सराबोर होता रहा!....ऐसे में हमारी फिल्में कमाल दिखाती है...फ़िल्मी गानों की धुनों पर श्रोतागण भजनों का खूब आनंद गटकते है!....जागरण में राम-सीता के वनवास का वर्णन किया जा रहा था....राम सीता माता से अपने प्यार का इजहार कर रहे थे...महाराज श्री ने भजन छेड़ दिया और श्रोता गण प्रेम-रस में डूब गए...राम जी , जानकी मैया से कह रहे थे....
" सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, मुझे तुमसे प्यार था...आज भी है और कल भी रहेगा!..वाह , वाह...श्रोता गण मंत्र-मुग्ध हो रहा था..तालिया बजा रहा था!...राम-सीता के अलौकिक प्रेम की कहानी को गले से नीचे उतार रहा था..कुछ श्रोता महाराज श्री के साथ गा भी रहे थे...
...इसके बाद...संत मीरा बाई के एक भजन को चांस दिया गया...श्रोता गण झुमने लगा!...'राधा का भी शाम हो तो मीरा का भी शाम ....अब मीरा और राधा के बिना श्याम तो अधूरे ही माने जाते है...सो कृष्ण कन्हैया की कहानी आलापी गई!...वाह, वाह!...राधा का कृष्ण-प्रेम क्या कहने!..अब बारी आई कृष्ण और सुदामा की!
...कहानी शुरू हुई उनके बचपन के प्यार की!...करते करते जवानी तक पहुंच गई!...समय ने करवट बदली कृष्ण द्वारकाधीश बन गए!,,, उन्हें राजगद्दी मिल गई! ...लेकिन सुदामा के समय ने करवट बदली ही नहीं!..वह पहले भी फटेहाल थे और शादी के बाद, बच्चे पैदा होने के बाद भी ....बेचारे गरीबी से झुझते रह गए!...अब भाग्य पर किसका बस चलता है, जो सुदामा का चलेगा?
...लेकिन सुदामा ने हिम्मत हारी नहीं ..वे अपने बचपन के सखा 'कृष्ण ' से मिलने द्वारकापुरी चले गए... हो सकता है ,बचपन का प्रेम कोई कारनामा कर दिखाए...
...और महाराज श्री ने एक फ़िल्मी कव्वाली की धुन का इस्तेमाल करते हुए भजन आरम्भ किया..." अरे पहरेदारों !...कन्हैयासे कह दो ...सुदामा महल के करीब आ गया है!...लोग तालियाँ बजा रहे है...महाराज श्री का गाने में भी साथ दे रहे है...अब हमने भी गाने में साथ देना शुरू कर दिया.....'सुदामा महल के करीब आ गया है!'
...रात गहरा रही थी और हमें नींद ने धर दबोचा ...अब सपने में हमें एक सुंदर सा महल दिखाई दे रहा था...चारो और लहलहाते खेत, हरेभरे पेड़ ...अहाहा..हा ...क्या सीन था! ...शायद यह पाकिस्तान के एबटाबाद का इलाका था...महल ओसामा का था ...महल पर एक हैलिकोप्टर मंडरा रहा था !...हैलिकोप्टर अमेरिका का ही होने का अंदेशा भी हमें हो गया ....इधर महाराज श्री गा रहे थे...सुदामा महल के करीब आ गया है...अब हमारे मुंहसे छूटते ही निकल गया...
"...अरे पाक वालों !..ओसामा से कह दो...ओ,ओ.....ओबामा महल के करीब आ गया है!"
..और जमा लोग भी नींद की ही गिरफ्त में थे ...वे भी हमारा साथ देने लग गए...'ओबामा महल के करीब आ गया है!'.....'ओबामा महल के करीब आ गया है!'
...और महाराज श्री भजन गाना छोड़ कर माइक पर चिल्लाए..." ये क्या तमाशा हो रहा है?...ये ओसामा ...ये ओबामा बीच में कहाँ से टपक पड़े?..."
॥
और सोए हुए लोग जाग गए...हम भी जाग गए...अब भजन फिर पूर्ववत गाया जाने लगा...कन्हैया और सुदामा की जयजय-कार हुई...
...ठीक इस के दो दिन बाद...जगराते में देखा गया हमारा सपना सच हो गया और ओबामा ने ओसामा को धर दबोचा!....
...अब हम 'हे राम' को ...ओ रामा! कहेंगे ...और 'हे शाम' को ...ओ शामा! कहेंगे! किसी को हर्ज है?....अगर दूसरे ब्लोगर साथियों को सपने आते है और वे सच हो जाते है..तो हम भला पीछे क्यों रहेंगे...जय हो...ओरामा!...जय हो ओशामा!
( फोटो गूगल से ली हुई है!)
...एक जगराते में..याने कि जागरण में...हमारा जाना हुआ!....जगराता 'माता' का था...लेकिन जैसे कि आप सभी जानते है, सिर्फ 'माता' का नाम या भजनों से काम नहीं चलता!...जगराते में शिवजी, कृष्ण कन्हैया, राधा, राम-लक्ष्मण-सीता और अनेक देवी-देवताओं को एंट्री दी जाती है!..अब तो श्री सत्य साईबाबा भी शामिल हो चुके है....लगता है आगामी कुछ सालों में महात्मा गांधी और अंबेडकर भी शिरकत करें!
...तो हम जागरण याने कि जगराते का आनंद लूट रहे थे!....एक के बाद एक देवी-देवताओं का आगमन होता रहा...जयजय-कार होती रही!...वातावरण भजनों के रस से सराबोर होता रहा!....ऐसे में हमारी फिल्में कमाल दिखाती है...फ़िल्मी गानों की धुनों पर श्रोतागण भजनों का खूब आनंद गटकते है!....जागरण में राम-सीता के वनवास का वर्णन किया जा रहा था....राम सीता माता से अपने प्यार का इजहार कर रहे थे...महाराज श्री ने भजन छेड़ दिया और श्रोता गण प्रेम-रस में डूब गए...राम जी , जानकी मैया से कह रहे थे....
" सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, मुझे तुमसे प्यार था...आज भी है और कल भी रहेगा!..वाह , वाह...श्रोता गण मंत्र-मुग्ध हो रहा था..तालिया बजा रहा था!...राम-सीता के अलौकिक प्रेम की कहानी को गले से नीचे उतार रहा था..कुछ श्रोता महाराज श्री के साथ गा भी रहे थे...
...इसके बाद...संत मीरा बाई के एक भजन को चांस दिया गया...श्रोता गण झुमने लगा!...'राधा का भी शाम हो तो मीरा का भी शाम ....अब मीरा और राधा के बिना श्याम तो अधूरे ही माने जाते है...सो कृष्ण कन्हैया की कहानी आलापी गई!...वाह, वाह!...राधा का कृष्ण-प्रेम क्या कहने!..अब बारी आई कृष्ण और सुदामा की!
...कहानी शुरू हुई उनके बचपन के प्यार की!...करते करते जवानी तक पहुंच गई!...समय ने करवट बदली कृष्ण द्वारकाधीश बन गए!,,, उन्हें राजगद्दी मिल गई! ...लेकिन सुदामा के समय ने करवट बदली ही नहीं!..वह पहले भी फटेहाल थे और शादी के बाद, बच्चे पैदा होने के बाद भी ....बेचारे गरीबी से झुझते रह गए!...अब भाग्य पर किसका बस चलता है, जो सुदामा का चलेगा?
...लेकिन सुदामा ने हिम्मत हारी नहीं ..वे अपने बचपन के सखा 'कृष्ण ' से मिलने द्वारकापुरी चले गए... हो सकता है ,बचपन का प्रेम कोई कारनामा कर दिखाए...
...और महाराज श्री ने एक फ़िल्मी कव्वाली की धुन का इस्तेमाल करते हुए भजन आरम्भ किया..." अरे पहरेदारों !...कन्हैयासे कह दो ...सुदामा महल के करीब आ गया है!...लोग तालियाँ बजा रहे है...महाराज श्री का गाने में भी साथ दे रहे है...अब हमने भी गाने में साथ देना शुरू कर दिया.....'सुदामा महल के करीब आ गया है!'
...रात गहरा रही थी और हमें नींद ने धर दबोचा ...अब सपने में हमें एक सुंदर सा महल दिखाई दे रहा था...चारो और लहलहाते खेत, हरेभरे पेड़ ...अहाहा..हा ...क्या सीन था! ...शायद यह पाकिस्तान के एबटाबाद का इलाका था...महल ओसामा का था ...महल पर एक हैलिकोप्टर मंडरा रहा था !...हैलिकोप्टर अमेरिका का ही होने का अंदेशा भी हमें हो गया ....इधर महाराज श्री गा रहे थे...सुदामा महल के करीब आ गया है...अब हमारे मुंहसे छूटते ही निकल गया...
"...अरे पाक वालों !..ओसामा से कह दो...ओ,ओ.....ओबामा महल के करीब आ गया है!"
..और जमा लोग भी नींद की ही गिरफ्त में थे ...वे भी हमारा साथ देने लग गए...'ओबामा महल के करीब आ गया है!'.....'ओबामा महल के करीब आ गया है!'
...और महाराज श्री भजन गाना छोड़ कर माइक पर चिल्लाए..." ये क्या तमाशा हो रहा है?...ये ओसामा ...ये ओबामा बीच में कहाँ से टपक पड़े?..."
॥
और सोए हुए लोग जाग गए...हम भी जाग गए...अब भजन फिर पूर्ववत गाया जाने लगा...कन्हैया और सुदामा की जयजय-कार हुई...
...ठीक इस के दो दिन बाद...जगराते में देखा गया हमारा सपना सच हो गया और ओबामा ने ओसामा को धर दबोचा!....
...अब हम 'हे राम' को ...ओ रामा! कहेंगे ...और 'हे शाम' को ...ओ शामा! कहेंगे! किसी को हर्ज है?....अगर दूसरे ब्लोगर साथियों को सपने आते है और वे सच हो जाते है..तो हम भला पीछे क्यों रहेंगे...जय हो...ओरामा!...जय हो ओशामा!
( फोटो गूगल से ली हुई है!)
Thursday, 5 May 2011
लंदन और आसपास की जगहें...
लंदन और आसपास के इलाकों के बारे में ..जानकारी चाहिए!
मैं अगले महीने जून में लंदन जाने का प्रोग्राम बना रही हूँ!...किसी पॅकेज टूर के अंतर्गत जाने की सोच रही हूँ!...मैं और मेरे हसबंड..दोनों ही यूरोप घुमने का प्रोग्राम बना रहे है!...क्या पॅकेज टूर इंडिया से ले कर जाना ठीक रहेगा या लंदन जा कर वहां से लेना ठीक रहेगा? ...लंदन में मेरे जेठजी के यहां चार-पांच दिन रहने का प्रोग्राम भी है!...क्या लंदन से पॅकेज टूर ले कर जर्मनी में प्रोग्राम की समाप्ति हो ऐसे भी पॅकेज मिल सकते है ?....जर्मनी में मैं अपनी बिटिया के यहां दो महीने रह कर इंडिया वापस आना चाहती हूं!...अगर पॅकेज टूर प्रोवाइड करने वाली ऐसी कोई कंपनी का नाम और फोन नंबर अगर मुझे मिल सकता है तो...आभारी रहूंगी!..लंदन निवासी ब्लोगर साथियों से मिलने की भी मेरी दिली इच्छा है... जर्मनी में श्री.राज भाटिया जी से भी मिलना चाहूंगी!...
...आप से अनुरोध है कि कृपया मेरा मार्ग-दर्शन करें!...
...यह जानकारी मैं समझती हूं कि सभी के लिए उपयुक्त रहेगी!
मैं अगले महीने जून में लंदन जाने का प्रोग्राम बना रही हूँ!...किसी पॅकेज टूर के अंतर्गत जाने की सोच रही हूँ!...मैं और मेरे हसबंड..दोनों ही यूरोप घुमने का प्रोग्राम बना रहे है!...क्या पॅकेज टूर इंडिया से ले कर जाना ठीक रहेगा या लंदन जा कर वहां से लेना ठीक रहेगा? ...लंदन में मेरे जेठजी के यहां चार-पांच दिन रहने का प्रोग्राम भी है!...क्या लंदन से पॅकेज टूर ले कर जर्मनी में प्रोग्राम की समाप्ति हो ऐसे भी पॅकेज मिल सकते है ?....जर्मनी में मैं अपनी बिटिया के यहां दो महीने रह कर इंडिया वापस आना चाहती हूं!...अगर पॅकेज टूर प्रोवाइड करने वाली ऐसी कोई कंपनी का नाम और फोन नंबर अगर मुझे मिल सकता है तो...आभारी रहूंगी!..लंदन निवासी ब्लोगर साथियों से मिलने की भी मेरी दिली इच्छा है... जर्मनी में श्री.राज भाटिया जी से भी मिलना चाहूंगी!...
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