Friday, 8 March 2013

महिला दिवस...एक अर्थ पूर्ण दिवस!

अगर महिलाएं समझ सकें...

...आज महिला दिवस पर महिलाएं और पुरुष सभी अपने विचार व्यक्त कर रहे है!...महिलाओं की प्रगति कैसे हो, महिलाओं को समाज में सम्माननीय स्थान कैसे प्राप्त हो, महिलाओं की सुरक्षा के लिए सरकार कौनसे कदम उठाएं और इस दिशामें महिलाओं को स्वयं को क्या करना चाहिए.....यही मुद्दे चर्चा का विषय बने हुए है!

...अभी अभी मैंने एक महिला लेखिका द्वारा लिखा हुआ लेख पढ़ा!...पूरे लेख में पुरुषों की जितनी बुराइयां हो सकती है, वह की गई है!...पत्नियों पर पति कितने अत्याचार करतें है, मानसिक और शारीरिक कितनी प्रताडना करतें है..यह सब विस्तार पूर्वक अच्छे ढंग से दर्शाया गया है...अगर इस लेख को ..सिर्फ एक लेख के ही नजरिए से पढ़ा जाए तो इसे बेहतरीन. उम्दा, उत्तम प्रस्तुति करण ...इत्यादि शब्दों से नवाजा जाना चाहिए!...लेकिन यथार्थ के नाम पर यह बहुत ही कमजोर है!...यह लेख पढ़ कर लगता है कि पुरुषों का मुख्य काम सिर्फ स्त्रियों को अपमानित करना, दबा कर रखना, उनकी अवहेलना करना और उन से मुफ्त में घर के काम करवाना ही है!..

...क्या हमारे समाज का पुरुष वर्ग ऐसा ही है?...पिता, भाई, पति..सभी स्वार्थी है और स्त्रियों को सिर्फ भोग्या समझ कर उनके साथ व्यवहार करतें है?...उनके दिल में लाड, प्यार, मोहोब्बत जैसी नाजुक भावनाओं का अंश मात्र नहीं है?...हां!...आए दिन स्त्रियों पर होने वाले बलात्कार की ख़बरें दिल दहला देने  वाली होती है...निर्भया के साथ दुराचार करके उसके प्राण हरण करने वाले नर-पिशाचों को फांसी की सजा मिलनी ही चाहिए...यह भी घिनौना सच है!...लेकिन ऐसे कुकर्म करने वाले व्यक्ति क्या पुरुष कहलवाने के लायक होते है?....उन्हें तो जानवर या नर-पिशाच कह कर ही संबोधित करना चाहिए!...वे अपराधी होते है...सजाके लायक होते है!...पुरुषोचित गुण उनके अंदर कहाँ मौजूद होते है?...उनको ले कर समस्त पुरुष जाति पर लांछन लगाना ठीक नहीं है!

...पति-पत्नी में झगड़े और मन-मुटाव होते रहते है....सामंजस्य भी स्थापित हो जाता है!...पहले कुछ दशकों के मुकाबले अब परिस्थिति में बदलाव आ चुका है!..स्त्री शिक्षा को समाज की तरफ से और सरकार की तरफ से अधिक महत्व दिया जा रहा है!...स्त्रियों के लिए विविध कार्यक्षेत्र भी खुले हुए है!....एक सुरक्षा के मामले को ले कर समाज और सरकार बराबर चिंतित है...इस समस्या का हल भी जल्दी ही ढूंढा जाएगा ऐसी उम्मीद करना कोई ज्यादती नहीं है!

..ज़रा गौर करें!...बहाद्दूरी,हिम्मत, धैर्य, उदारता, मन की स्थिरता, मन की कठोरता ..ये सभी गुण एक अच्छे पुरुष में मौजूद होते है..क्या इन गुणों का अनुकरण करने की शिक्षा स्त्रियों को नहीं दी जानी चाहिए?

अपना ही उदाहरण पेश करती हूँ!....एक समय मेरे जीवन में ऐसा आया था...मैं अवसाद से घिर गई थी...एक राजकीय पार्टी की कन्वीनर के तौर पर नियुक्त थी...उस समय स्व.चिमनभाई पटेल( बाद में गुजरात के मुख्य मंत्री निर्वाचित हुए थे!) से मिलना होता रहता था!...उन्होंने मुझे एक दिन सलाह दी कि" अरुणा,तुम अपने आप को स्त्री मत समझो!..पुरुष समझो!...तुमारी समस्या का यही निदान है!"...मैंने उनकी सलाह सिर आँखों पर उठा ली ...और अपनी मानसिकता को बदल डाला...मेरे अंदर  एक नई जागृति आ गई!...तब मुझे लगा कि जिसे बहुत बड़ी समस्या मानकर मैं हैरान-परेशान थी, असल में मेरी कोई समस्या थी ही नहीं!

....महिला दिवस पर मैं यही कहना चाहूंगी कि अपराधी वर्ग को ले कर,पुरुषों को बुरा चित्रित करना गलत है...स्त्री भी पुरुषोचित गुणों का अपने अंदर विकास करके बहुत सी समस्याओं से समाधान पा सकती है!

Friday, 27 April 2012

संसद सदस्य?..आप भी बन सकतें है!...(व्यंग्य)

राज्य-सभा के नजारें....

सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट के मैदान में जितने भी रन बनाएं, जितनी भी पारियां खेली, जितने भी छक्के या चौके लगाएं....सब कुछ देश के लिए किया!...इस देश-सेवा के बदले में उन्हें बहुतसा धन मिला, कारें मिली, मोटर साइकिलें मिली, वाह-वाही मिली, एडज मिली..एडज के ऐवज में फिर कंपनियों की तरफ से धन मिला...लेकिन अब तक वे राज्य-सभा के संसद नहीं थे....तो अब बिना चुनाव लड़े उन्हें संसद सदस्य की कुर्सी ऑफर की गई....जय हो कोंग्रेस....बहुत अच्छा लगा!


...होकी, फुटबॉल, टेनिस, चेस, ओलिम्पिक दौड....सभी जगहों पर देश-सेवक काम में लगे हुए है....बस!..देश के बाहर जिसे लोग पहचानने लग गए....वह देश-सेवा की योग्यता की परीक्षा में पास हो गया और संसद सदस्य की कुर्सी शोभायमान करने के लायक हो गया समझों!

...रेखा जी को भी राज्य-सभा की  संसदगिरी ऑफर हुई!....फिल्मों में कई तरह के रोल कर के इन्होनें  भी देश-सेवा की....विदेशी लोग इन्हें पहचानने लग गए....एक्टिंग इन्होने फोगट में नहीं की...तो क्या हुआ?...ऑफिस में काम करने वाले कर्मचारी क्या  तनख्वाह नहीं लेते?....

.....कुछ लोगों ने सौरव गांगुली, कपिल देव....वगैरें के नाम सुझाएँ है....लिस्ट बहुत लंबी है...यह सभी बिना चुनाव लड़े, मनोनीत हो कर.... संसद सदस्य बनने की योग्यता रखते है... सभी देश-सेवक ही तो है!...राखी सावंत,मल्लिका शेरावत, मलाइका अरोरा खान जैसी आइटम डांस करने वाली सुंदरियाँ.... करीना कपूर, कैटरीना कैफ, विद्या बालान जैसी मंजी हुई नायिकाएं...यह सभी देश से बाहर भी पहचानी जाती है ...तो देश-सेवा ही तो कर रही है!....'खान'...सरनेम वाले नायकों की लंबी लिस्ट है....कुमारों की भरमार है....और एकता कपूर, चेतन भगत जैसे परदे के पीछे रहकर देश-सेवा में ओत-प्रोत रहने वाले भी अनगिनत है!

...तो अब चुनावी बिगुल बजा कर देश के आम आदमी की नींद खराब करने की जरुरत नहीं है!...हमारा देश, देश-सेवकों से भरा पड़ा है.....इनके हाथ में देश का स्टीयरिंग थमा कर आम आदमी चैन की बंसी बजा सकता है!....चुनावों में खर्च होने वाले पैसे बचा कर रोटी खा सकता है!....देश की गाड़ी देश के सेवक अन्दाधुन्द तरीके से चलाते ही रहेंगे!...उन पर भरोसा कर के आम आदमी भी देश-सेवा करने का पुण्य कमा सकता है!

...अगर ब्लॉग लिखते लिखते, आपको भी विदेशी लोग पहचानने लग गए....और कोंग्रेस जैसी देश-सेवी पार्टी की नजर आप पर भी पड़ गई.....तो क्या बात है!....आप भी देश-सेवक की लिस्ट में भर्ती हो गए....आप भी ठाठ से राज्य-सभाके मनोनीत सदस्य बन कर सचिन तेंदुलकर की तरह चमकदार दांतों की मुस्कुराहट वाली फोटो खिंचवा सकतें है!...कोई नहीं पूछेगा कि आप 'पॉलिटिक्स' का...क, ख,ग....भी जानते है या नहीं! 

Tuesday, 28 February 2012

नेहरू खानदान की असलियत जान कर.....

नेहरू खानदान की असलियत जान कर....

माननीय दिव्याजी!

नेहरू खानदान की असलियत आप के ब्लॉग पर पढी!...कोमेंट लिखने के लिए कोई प्रबंध नहीं पाया गया...इसी वजह से आपकी पोस्ट यहाँ दे रही हूँ...अगर आपको कोई एतराज हो तो बताएं...मैं तुरंत इसे डिलीट कर दूंगी!

...यहाँ दी गई जानकारी या खोजबीन श्री दिनेशचन्द्र मिश्राजी की है और वे अपने ब्लॉग पर इसे क्रमश: प्रस्तुत कर रहे है...मतलब कि आपने उनकी पोस्ट अपने ब्लॉग पर दी है....जो कि बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है!

.....खोज बीन में यही पता चला है कि नेहरू खानदान हिन्दू और मुसलमान...दोनों धर्मों का मिलन है !...यहाँ नेहरू के सौतेले भाई शेख अब्दुल्ला का उल्लेख नहीं हुआ है!...जो जवाहरलाल नेहरू के पिता...मोतीलाल नेहरू की दूसरी मुस्लिम पत्नी की कोख से जन्मे बेटे थे!उन्होंने मुस्लिम धर्म स्वीकार किया था! ....यह खोज भी जगजाहिर हो चुकी है!...लेकिन नेहरू परिवार किसी अपराधिक मामले में फंसा हुआ कभी पाया नहीं गया!

....आपने इस पोस्ट में नेहरू परिवार की बहुत सी अन्य गोपनीय बातों पर से भी पर्दा उठाया है....लेकिन क्या इससे नेहरू-गांधी परिवार के बारे में जो जनता की सोच है....उसमें फर्क आ सकता है?

.....हाँ! वर्त्तमान राजनीति में यह परिवार,सत्ता की मजबूत बागडोर हाथ में होते हुए भी....जनता के हित के लिए कुछ नहीं कर रहा और आश्वासनों के सिवाय कुछ नहीं दे रहा ....यही सत्य हकीकत है!...इसी मुद्दे को ले कर जनता इस परिवार से मुंह मोड़ ले ....यही हो सकता है!

आपके पोस्ट की लिंक मैं यहाँ दे रही हूँ....http://zealzen.blogspot.in/2012/02/blog-post_29.html

....अति महत्वपूर्ण जानकारी...आभार!
-अरुणा कपूर.

Monday, 20 February 2012

सन-ग्लासेस पहनिएँ...स्टाइलिश नजर आइएं,व्यक्तित्व निखारिएँ...

सन-ग्लासेस् पहनिएँ...स्टाइलिश नजर आइएं, व्यक्तित्व निखारिएँ....

सन-ग्लासेस से मै बचपन से ही आकर्षित हूँ....बचपन में दादा-दादी के साथ मै गुजरात के जादर के मेले में घुमने जाया करती थी तब...बैलून या गुड्डा-गुडिया बेचने वालों के पास बाद में जाती थी; सब से पहले तो रंग-बिरंगी चश्में ले कर बैठे हुए दुकानदार के पास ही भाग कर पहुँच जाती थी...वहांसे तीन-चार सुन्दर से रंग-बिरंगी चश्में खरीदने के बाद ही दूसरी चीजों पर मेरी नजर ठहरती थी!... खैर! बचपन बीत गया और उम्र के पचपन का पड़ाव भी मैंने पार कर लिया...लेकिन सन-ग्लासेस अब भी मुझे आकर्षित करते है!...जब मै सन-ग्लासेस पहन कर किसी पार्टी में जाती हूँ या बाजार में शोपिंग करने जाती हूँ...तब मेरी स्टाइल और व्यक्तित्व में निखार इन्ही की वजह से आता है!....क्यों कि मै अपने आप में एक अलग तरह का कॉन्फिडेन्स महसूस करती हूँ!....प्रोफाइल में मेरी फोटो देख सकते है!...
....जब मेरी नजर Ray-Ban RB 2140 पर पडी ( ऊपर फोटो देखिएँ)...
....तो लगा कि यह सन-ग्लासेस मेरे लिए अनुकूल है!...इससे मेरे स्टाइल में ज्यादा बढोतरी हो सकती है!...जाहिर है कॉन्फिडेन्स में भी और ज्यादा बढोतरी हो सकती है!....तो यह मेरी पसंद पर खरे उतरने वाले सन-ग्लासेस है!


Wow!…..मुझे यह सन-ग्लासेस भी पसंद आए है....यह ब्राउन शेड लिए हुए है...और इनका फ्रेम भी मेरे चेहरे के अनुकूल है!...यह शायद लाइट वेटेड है!....इन्हें पहन कर बहुत बढ़िया और स्टाइलिश लुक मुझे मिल सकता है! व्यक्तित्व में और निखार आ सकता है और कॉन्फिडेन्स में और ज्यादा बढोतरी हो सकती है!.... इनकी पहचान भी मै यहाँ दे रही हूँ.....
यह है ......Ray-Ban RB 8301.....
वाह क्या बात है!.....मेरी पसंद के तो यह दो स्टाइलिश सन-ग्लासेस है!....वैसे मै तो सभी से कहूंगी के अपनी अपनी पसंद के सन-ग्लासेस को जल्दी जल्दी अपने कब्जे में कीजिए....देर किस बात की? ....Go for 'My Sunglasses, My Style'


This entry is a part of the contest at BlogAdda.com brought to you by GKB Optical Sunglasses

Friday, 10 February 2012

मेरी पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है...फ्लिपकार्ट वेबसाइट पर!

मेरी पुस्तक ऑनलाइन उपलब्ध है... फ्लिपकार्ट वेबसाइट पर!

....अभी अभी मुझे हिन्दयुग्म के संपादक श्री। शैलेश भारतवासी की तरफ से यह शुभ-सन्देश प्राप्त हुआ है!
...धन्यवाद शैलेश जी!

...मै उन सभी का यहाँ फिर से धन्यवाद करना चाहूंगी जिन्होंने मेरे उपन्यास ' उनकी नजर है...हम पर !' की समीक्षा,प्रशंसा एवं आलोचना भी की है!...इस उपन्यास को मंगवाने के मेरे ई- मेल पर कई मैसेज भी आए और मैंने उन्हें श्री.शैलेश जी से संपर्क करने के लिए कहा था!

शैलेश जी लिखते है....

आदरणीया अरुणा जी,
यह बताते हुए हमें अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आपकी पुस्तक, किताबों को ऑनलाइन बेचने वाली कंपनी प्लिपकार्ट की वेबसाइट पर विक्रय के लिए उपलब्ध करा दी गयी हैं। यह वेबसाइट किताबों को क्रेता तक 3-4 दिनों में पहुँचा भी देती है।
आपकी पुस्तक का flipkart लिंक-
उनकी नजर है हम पर-
http://www.flipkart.com/books/8191038528?_l=b3JUm9Vsc9d2jQzOHTXUhw--&_r=q0z9FKSAm15_zCGhZRG0TA--&ref=a39c3bbc-1256-437a-90c2-c366175e7b24

प्लिपकार्ट पर आपके नाम का पेज-
http://www.flipkart.com/author/aruna-kapoor
हिंद-युग्म की सभी किताबों का संक्षिप्त विवरण- http://www.flipkart.com/search-books/hind+yugm
आप इन लिंकों को अपने प्रसंशकों को भेजकर उन्हें यह सूचित कर सकते हैं कि यदि वे इस पुस्तक को भारत में कहीं भी मँगाना चाहें तो मँगा सकते हैं। अब उन्हें इसके लिए किसी पुस्तक बेचने वाली दुकान तक जाने की जरूरत नहीं है।
आप अपने फ्लिपकार्ट पेज को फेसबुक पर भी शेयर कर सकती हैं। इन लिंकों को अपने ब्लॉग पर लगा सकती हैं।
धन्यवाद।
निवेदक-शैलेश भारतवासी

Saturday, 10 September 2011

हाय रे दोस्ती!...(व्यंग्य)



'दोस्ती ' टेम्पररी चीज होती है! ( व्यंग्य )

हमारी समझ में जो आया है वह यही है कि भैया! दोस्ती एक टेम्पररी चीज होती है !...

....अब आप फ़िल्मी कहानियों में उतर कर देखो तो दोस्त और दोस्ती को इतनी गहराई तक ले जाते है कि पूछो मत!...फ़िल्मी दोस्त और उनकी दोस्ती के कद को देखते हुए हम गैर फ़िल्मी लोग, अपने आप को बौनो की कैटेगरी में डालने के लिए मजबूर हो जाते है!...लगता है हम अपने दोस्त के लिए कुछ भी तो नहीं कर रहे ....कैसे मनुष्य है हम!...हम तो मनुष्य कहलवाने के भी लायक नहीं है!....और हमारा दोस्त भी यही सोचता है कि 'मै कितना स्वार्थी हूँ...मैंने तो दोस्ती के नाम को डुबो कर ...नहीं यार!...कलंकित करके रख दिया!'

...अरे फ़िल्मी कहानियों में तो एक दोस्त के लिए दूसरा दोस्त....अपनी प्रेमिका, कोठी, बंगलें, कारें और माँ-बाप तक को किनारे करने में देर नहीं लगाता!....जान तो बहुत ही सस्ती चीज होती है!....उसे भी दोस्ती के नाम कर दिया जाता है...लेकिन हम अपनी बात करें तो....हमारे लिए तो भैया यही सब चीजें प्रेमिका वगैरा वगैरा ...जी जान से प्यारी होती है!...दोस्ती के नाम हम इनमें से किसीका भी त्याग नहीं कर सकते!...दोस्ती के नाम पर हम बस! कभी कभार दोस्त के साथ चाय-पानी गटक सकते है,फिल्म देखने जा सकते है या फोन और इंटरनेट का इस्तेमाल कर सकते है!...कुछ यारदोस्त लोग कपडे या पैसे उधार लेते या देते है....लेकिन उधारी के चक्कर में जब चीज वापस करने की नौबत आती है तो दोस्ती के दूध का दही बनते देर नहीं लगती!

...याद आया! अपने महान बीग बी..अमिताभ बच्चन जी...और महान राजकीय हस्ती अमर सिंह जी भी दोस्ती की नौका में कुछ ही समय पहले सवार थे...अमर सिंह जी ने तो बच्चन जी को बड़े भाई का दरज्जा दे रखा था!..दोस्ती की धूम मची हुई थी!...जहाँ भी जाते थे ...साथ साथ जाते थे...अमर सिंह जी का मुंबई का एड्रेस...बच्चन जी का घर' जलसा' या 'प्रतीक्षा' था!...सभी को याद होगा कि अमर सिंह जी ने कुछ ही साल पहले बच्चन जी के बेटे को बर्थ डे गिफ्ट के तौर पर एक बहुत महंगी कार भी दी थी...भैया! इस बात का बवंडर उठना चाहिए तो नहीं था ...लेकिन उठा था!...अब कार तो कोई भी हो...महंगी तो होगी ही...लेकिन लोगो को कहने, बोलने,लिखने या फोटोएँ दिखाने से कौन रोक सकता है? ...दोस्त्ती को लोग समझे तो कुछ बात बने!....तो उस कार की इतनी एडवरटाइज हो गई कि पूछो मत!


...लेकिन समय ने पलटा खाया....ऐसा हुआ कि इन दोनों दिग्गजों की दोस्ती का बल्ब हमने टूटते हुए देखा...बहुत कुछ हुआ ! आखरी खबर के मुताबिक़ अमर सिंह जी दिल्ली की तिहाड जेल में पहुचाएं गए...वे बीमार भी थे ...उनके बहुत से करीबी उनसे मिलने तिहाड़ जेल पहुँच भी गए ...लेकिन ऊं हूँ!..बच्चन जी नहीं गए...अब दोस्ती के बारे में हम और क्या कह सकते है?

...और भी बहुतसी फ़िल्मी हस्तियाँ और राजनीतिज्ञों के बारे में ऐसा ही देखने और सुनने को मिला....जो समय की नजाकत पहचान कर कभी दोस्त तो कभी दुश्मन के किरदार में नजर आते है!....तब हम इस नतीजे पर पहुंचें कि आम आदमी भी गया- गुजरा नहीं है!....वह भी दिग्गजों वाली हैसियत रखता है!दोस्ती की कहानियाँ सिर्फ नाटक या फिल्मों की शोभा बढाने के लिए ही होती है!...बहुत सी अन्य चीज-वस्तुओं की तरह दोस्ती भी एक टेम्पररी चीज होती है!

( फोटो गुग्गल से ली हुई है!)

Wednesday, 11 May 2011

राम को 'ओरामा!' और शाम को 'ओशामा'..क्यों न कहे?






ओसामा, ओबामा या सुदामा...


सभी में समाया 'आमा'!

...एक जगराते में..याने कि जागरण में...हमारा जाना हुआ!....जगराता 'माता' का था...लेकिन जैसे कि आप सभी जानते है, सिर्फ 'माता' का नाम या भजनों से काम नहीं चलता!...जगराते में शिवजी, कृष्ण कन्हैया, राधा, राम-लक्ष्मण-सीता और अनेक देवी-देवताओं को एंट्री दी जाती है!..अब तो श्री सत्य साईबाबा भी शामिल हो चुके है....लगता है आगामी कुछ सालों में महात्मा गांधी और अंबेडकर भी शिरकत करें!

...तो हम जागरण याने कि जगराते का आनंद लूट रहे थे!....एक के बाद एक देवी-देवताओं का आगमन होता रहा...जयजय-कार होती रही!...वातावरण भजनों के रस से सराबोर होता रहा!....ऐसे में हमारी फिल्में कमाल दिखाती है...फ़िल्मी गानों की धुनों पर श्रोतागण भजनों का खूब आनंद गटकते है!....जागरण में राम-सीता के वनवास का वर्णन किया जा रहा था....राम सीता माता से अपने प्यार का इजहार कर रहे थे...महाराज श्री ने भजन छेड़ दिया और श्रोता गण प्रेम-रस में डूब गए...राम जी , जानकी मैया से कह रहे थे....

" सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, मुझे तुमसे प्यार था...आज भी है और कल भी रहेगा!..वाह , वाह...श्रोता गण मंत्र-मुग्ध हो रहा था..तालिया बजा रहा था!...राम-सीता के अलौकिक प्रेम की कहानी को गले से नीचे उतार रहा था..कुछ श्रोता महाराज श्री के साथ गा भी रहे थे...

...इसके बाद...संत मीरा बाई के एक भजन को चांस दिया गया...श्रोता गण झुमने लगा!...'राधा का भी शाम हो तो मीरा का भी शाम ....अब मीरा और राधा के बिना श्याम तो अधूरे ही माने जाते है...सो कृष्ण कन्हैया की कहानी आलापी गई!...वाह, वाह!...राधा का कृष्ण-प्रेम क्या कहने!..अब बारी आई कृष्ण और सुदामा की!

...कहानी शुरू हुई उनके बचपन के प्यार की!...करते करते जवानी तक पहुंच गई!...समय ने करवट बदली कृष्ण द्वारकाधीश बन गए!,,, उन्हें राजगद्दी मिल गई! ...लेकिन सुदामा के समय ने करवट बदली ही नहीं!..वह पहले भी फटेहाल थे और शादी के बाद, बच्चे पैदा होने के बाद भी ....बेचारे गरीबी से झुझते रह गए!...अब भाग्य पर किसका बस चलता है, जो सुदामा का चलेगा?

...लेकिन सुदामा ने हिम्मत हारी नहीं ..वे अपने बचपन के सखा 'कृष्ण ' से मिलने द्वारकापुरी चले गए... हो सकता है ,बचपन का प्रेम कोई कारनामा कर दिखाए...

...और महाराज श्री ने एक फ़िल्मी कव्वाली की धुन का इस्तेमाल करते हुए भजन आरम्भ किया..." अरे पहरेदारों !...कन्हैयासे कह दो ...सुदामा महल के करीब आ गया है!...लोग तालियाँ बजा रहे है...महाराज श्री का गाने में भी साथ दे रहे है...अब हमने भी गाने में साथ देना शुरू कर दिया.....'सुदामा महल के करीब आ गया है!'

...रात गहरा रही थी और हमें नींद ने धर दबोचा ...अब सपने में हमें एक सुंदर सा महल दिखाई दे रहा था...चारो और लहलहाते खेत, हरेभरे पेड़ ...अहाहा..हा ...क्या सीन था! ...शायद यह पाकिस्तान के एबटाबाद का इलाका था...महल ओसामा का था ...महल पर एक हैलिकोप्टर मंडरा रहा था !...हैलिकोप्टर अमेरिका का ही होने का अंदेशा भी हमें हो गया ....इधर महाराज श्री गा रहे थे...सुदामा महल के करीब आ गया है...अब हमारे मुंहसे छूटते ही निकल गया...

"...अरे पाक वालों !..ओसामा से कह दो...ओ,ओ.....ओबामा महल के करीब आ गया है!"
..और जमा लोग भी नींद की ही गिरफ्त में थे ...वे भी हमारा साथ देने लग गए...'ओबामा महल के करीब आ गया है!'.....'ओबामा महल के करीब आ गया है!'

...और महाराज श्री भजन गाना छोड़ कर माइक पर चिल्लाए..." ये क्या तमाशा हो रहा है?...ये ओसामा ...ये ओबामा बीच में कहाँ से टपक पड़े?..."

और सोए हुए लोग जाग गए...हम भी जाग गए...अब भजन फिर पूर्ववत गाया जाने लगा...कन्हैया और सुदामा की जयजय-कार हुई...

...ठीक इस के दो दिन बाद...जगराते में देखा गया हमारा सपना सच हो गया और ओबामा ने ओसामा को धर दबोचा!....

...अब हम 'हे राम' को ...ओ रामा! कहेंगे ...और 'हे शाम' को ...ओ शामा! कहेंगे! किसी को हर्ज है?....अगर दूसरे ब्लोगर साथियों को सपने आते है और वे सच हो जाते है..तो हम भला पीछे क्यों रहेंगे...जय हो...ओरामा!...जय हो ओशामा!
( फोटो गूगल से ली हुई है!)

ZEAL: रूह को सहलाती सुरभित समीर.....[A caressing breeze]

ZEAL: रूह को सहलाती सुरभित समीर.....[A caressing breeze]

Thursday, 5 May 2011

लंदन और आसपास की जगहें...

लंदन और आसपास के इलाकों के बारे में ..जानकारी चाहिए!

मैं अगले महीने जून में लंदन जाने का प्रोग्राम बना रही हूँ!...किसी पॅकेज टूर के अंतर्गत जाने की सोच रही हूँ!...मैं और मेरे हसबंड..दोनों ही यूरोप घुमने का प्रोग्राम बना रहे है!...क्या पॅकेज टूर इंडिया से ले कर जाना ठीक रहेगा या लंदन जा कर वहां से लेना ठीक रहेगा? ...लंदन में मेरे जेठजी के यहां चार-पांच दिन रहने का प्रोग्राम भी है!...क्या लंदन से पॅकेज टूर ले कर जर्मनी में प्रोग्राम की समाप्ति हो ऐसे भी पॅकेज मिल सकते है ?....जर्मनी में मैं अपनी बिटिया के यहां दो महीने रह कर इंडिया वापस आना चाहती हूं!...अगर पॅकेज टूर प्रोवाइड करने वाली ऐसी कोई कंपनी का नाम और फोन नंबर अगर मुझे मिल सकता है तो...आभारी रहूंगी!..लंदन निवासी ब्लोगर साथियों से मिलने की भी मेरी दिली इच्छा है... जर्मनी में श्री.राज भाटिया जी से भी मिलना चाहूंगी!...

...आप से अनुरोध है कि कृपया मेरा मार्ग-दर्शन करें!...

...यह जानकारी मैं समझती हूं कि सभी के लिए उपयुक्त रहेगी!

Friday, 29 April 2011

खटक रही है कुछ कमी...

आखिर हमने कह डाला...

क्या कहें?...
या फिर कुछ भी न कहें?
या फिर चुप ही रहे?....
यारो! ...आप ही बताएं....
आप की चुपकी को ...
आप की 'हाँ ' समझतें है....
ना..ना...करते हुए भी....
चलिए!...हम कुछ कहतें है......


चर्चा मंच पर गए थे हम....
पता चला एक समारोह का...
पता चला कुछ....
सन्मानित होने वाले...
ब्लॉगर साथियों का.....
इक्यावन नाम पढ़ लिए हमने.....
एक नहीं....ग्यारह बार पढ़े हमने....

क्या बताएं....
कुछ गले में अटक सा गया...
कुछ नाम और जुड़ने चाहिए थे...
ऐसा हमें रह रह कर लगा....

याद आए राज भाटियाजी...
वे नदारद थे लिस्ट में से....
मनोरंजन से भरपूर....
जिनकी हर पोस्ट पाई है हमने....
उनका 'तिलियार लेक 'वाला मेला ...
यार लोग कैसे भूल गए?...

हास्य कवि अलबेलाजी....
लिस्ट में अगर होते....
हास्य की तरंगे ...
पैदा हो जाती आप सुक.....
उन्हें देखने सुनने वाले...
हास्य-रंग में रंग जाते.....

संजय भास्कर मुस्कुराएँ इस लिस्ट में....
न 'झील' को समझा गया इस काबिल....
ताउजी, ताउजी कहते हुए कहकहे लगाने वाले...
कैसे भूल गए...उस रामपुरिया ताऊ को...

जिसने इतनी भावपूर्ण रचनाएं प्रस्तुत की...
कैसे भूल गए उस वन्दना को....
आशा जोगलेकर भी है...
बला की कवियित्री ......
यात्रा वृत्तान्त भी बहुत से दिए है इसने...
हिन्दी और मराठी ब्लोगिंग में.....
बहुत बड़ा योगदान है, इसका भी तो....
क्यों नाम नहीं है इसका लिस्ट में...

डॉ.नूतन 'नीति' ने भी यहाँ...
जीता है हम सबका मन.....
इसके नाम का भी देखिए....
नहीं हुआ है चयन....
रचना दीक्षित को भी साथियों...
क्यों भुलाया गया?....
यही सब सोच सोच कर....
हमारा सिर घूम गया.....

लिस्ट में हमें....
कुछ ऐसे नाम मिलें...
जो अनजान थे हम सबसे...
चाहे सुनने में कितने ही हो भले...

हाँ!...अगर सन्मानित करना था....
सिर्फ इक्यावन नामों को...
तो भी मुश्किल तो कुछ भी न था....
ब्लोगिंग में योगदान देने वाले....
अथाग मेहनत करने वाले....
कुछ नयापन पेश करने वाले....
झुझारू, कर्मठ और लायक...
ब्लॉगरों का चयन जरुरी था...

झुझारू कर्मठ और लायक...
कुछ नया कर दिखाने वाले...और मेहनतू
ब्लॉगर है इस लिस्ट में....
इनकार नहीं है हमें...
बल्कि..बहुत खुशी है हमें....
उन सबको बहुत बहुत बधाई....
कल ३० एप्रिल को है ब्लॉगर संमेलन....
ब्लोगर मिलन की सुमधुर घड़ी आई....

चाहते है हम कारवाँ यूँ ही चलता रहे....
नए..पुराने साथी...साथ मिल कर यूँ ही....
ब्लॉग जगत का सुहाना सफ़र ....
मस्त बन कर तय करते रहे...



Monday, 4 April 2011

...स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों की कहानी?

एक सीरियल'..ना आना इस देश मेरी लाडो!'



... सीरियल का नाम है..'ना आना इस देश मेरी लाडो..' ...जो मैं लगभग देढ साल से देख रही हूं!...क्या खूब नाम चुन कर रखा गया है सीरियल का!...कलर्स चैनल पर प्रतिदिन रात साढ़े दस बजे प्रसारित हो रहा है...शनीवार और रविवार अवकाश रहता है!


....इस सीरियल की शुरुआत में ही लिखा हुआ आता है कि यह किसी ख़ास परिवेश, धर्मं या जाति से संबंधित नहीं है ..इसमें स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों को ही दिखाया जा रहा है...वगैरा, वगैरा!


....जब से मैं देख रही रही हूं...इस सीरियल की कहानी एक 'भगवानी ' नाम की एक 'जालिम' महिला के इर्द-गिर्द ही घूम रही है!..विधवा है...पैसेवाली है,....यह अम्माजी के नाम से सर्वत्र जानी जाती है!....इसके तीन बेटे है...तीन बहुएं भी है!...नौकर, चाकर, देवर देवरानी और उनका बेटा और बेटी भी है!...भरा पूरा परिवार है!


....यही अम्माजी औरतों पर पूरजोर अत्याचार किए जा रही है!


...बहूएँ तो इसके नाम से कांप उठती है!...देवरानी की बेटी को घर में नौकरानी बना कर रखा हुआ है ..क्यों कि वह स्त्री है !..सबसे छोटे बेटे राघव की पत्नी सिया नई विचार धारा की है...सिया और राघव का प्रेम-विवाह है!...अम्माजी से वही सबसे ज्यादा प्रताड़ित होती दिखाई है!..घर में उसका बहुत बुरा हाल है!


...कहानी आगे बढ़ती है ...अम्माजी, देवरानी की बेटी की और उसकी सहेली की इसलिए हत्या करवाती है...क्यों कि वे दोनों सगोत्र के लड़कों से शादी करना चाहती थी!..लडकों की भी अम्माजी हत्या करवा देती है...कहानी की कमजोरी तो देखिए कि अम्माजी पर कोर्ट में केस भी चलता है पर वह निर्दोष छूट जाती है!


...आगे चल कर पता चलता है कि अम्माजी ने अपनी बेटी पैदा होने पर उसका त्याग कर दिया था...वही बेटी डाकू 'अंबा' बन कर अम्माजी से टक्कर लेती है...वाह भाई वाह!....इस समय अच्छा लगता है कि अम्माजी को मात मिलने वाली है...लेकिन अफ़सोस कि नहीं मिलती!...


.....अम्माजी की बहू 'सिया' जब जुडवा बेटियों को जन्म देती है..तब अम्माजी उन बेटियों को जान से मार डालने के लिए कई हथकंडे अपनाती है...लेकिन कामियाब नहीं होती!...न हुई तो क्या हुआ?....बेटियों को बचाने की कोशिश में बहू' सिया' मृत्यु के मुख में चली जाती है!...और अपनी पत्नी और बेटियों को बचाने वाला अम्माजी का बेटा राघव भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है...खैर ..दोनों बेटियां बच जाती है! ...एक बेटी 'दीया'अम्माजी के यहां पल रही है और दूसरी बेटी' जिया' अंबा पाल रही है!


....समय आगे बढ़ता है..अम्माजी अब गांव से दिल्ली आ चुकी है...यहां भी ठाठबाठ से रह रही है...कमाई का जरिया तो बेईमानी ही है!...अम्माजी की बेटी अंबा भी अब डकैती का काम छोड़ कर दिल्ली आ कर बस गई है!..वह शादियों के प्रबंधन का काम कर रही है!...इसकी भी कमाई अच्छी हो रही है!..अम्माजी और अंबा ..एक दूसरी के बारे में कुछ भी जानती नहीं है!..कहानी को आगे बढाने के लिए यह भी जरुरी था!


....अम्माजी के बेटे गलत काम में शुरू से ही साथ देते आए है...बेटा गजेन्द्र और जोगेंद्र अम्माजी के कहने पर और अपनी इच्छा से भी कई हत्याए कर चुके है ...नौकर 'यशपाल' भी खूंखार भेड़िए जैसा है...यह अम्माजी के इशारों पर अब तक कई खून कर चुका है...क़ानून की गिरफ्त में अब तक अम्माजी का कोई भी मोहरा नहीं फंसा है.... कहानी लेखक को बधाई!


...इधर अम्माजी के बेटे गजेन्द्र के बेटे ..याने कि अम्माजी के पोते की शादी अमेरिका निवासी लडकी से होने जा रही है...लेकिन अम्माजी की मरजी के खिलाफ कैसे हो सकती है?..अम्माजी बहुत अकलमंद तो है ही ...अब तक तो अक्ल का इस्तेमाल करके ही सैकड़ों अपराध कर चुकी है!...वह ऐसी चाल चलती है कि लडकी ही ऐन शादी के फेरों के समय शादी करने से इनकार कर देती है और अमेरिका वापस चली जाती है!...अम्माजी जो चाहती थी वही होता है!...लेखक को फिर एक बार बधाई देने का मन कर रहा है!..जय हो अम्माजी की!


...लेकिन शादी का प्रबंधन संजोग से ( ...ऐसे संजोग तो कहानियों में आते ही है ) अंबा के हाथ में है...इस वजह से अंबा के घर पल रही राघव और सिया की बेटी 'जिया ' इस शादी में उपस्थित है...वैसे भी वह अपनी जुडवा बहन 'दीया' की सहेली भी है...दोनों एक ही कोलेज और कक्षा में पढ़ रही है!...लेकिन असलियत जानती नहीं है!


....शादी के प्रबंधन के लिए एक युवा लडकी 'नेहा' भी कार्यभार संभाल रही है!..उस पर अम्म्माजी के पोते यानी कि देवर के बेटे की बुरी नजर है


...कहानी में अब गांठे लगाने का काम लेखक ने आरंभ कर दिया है!... .


..तो होता यह पोता 'नेहा' को बस में करने कि कोशिश करता है...लेकिन उसके हाथो इस बुरे काम को अंजाम देते वक्त 'नेहा' कि ह्त्या हो जाती है!...अम्माजी अब पोते को कानूनी शिकंजे से बचाने के दावपेच खेलती है!....देवर का बेटा हुआ तो क्या हुआ...उसका पुरुष होना और अम्माजी के खानदान से होना ही काफी है!....'दिया' ने खून होते हुए अपनी आँखों से देखा है.. तो इस दरमियान 'दिया' की गवाही अहम् होती है!...लेकिन दिया को कोर्ट जाने से रोकने के लिए अम्माजी गुंडे -बदमाश भेजती है !


...बहुत लड़ाई झगड़े और खून खराबा इस समय दिखाया गया है....और दिया को बचाते हुए अम्माजी की बेटी 'अंबा' जान गवां बैठती है!...बहुत ही दारुण प्रसंग दिखाया गया है!


....यह है इस सीरियल की अबतक की कहानी!...स्त्रियों पर होने वाला अत्याचारों की पराकाष्ठा जरुर दिखाई गई है...लेकिन क्या सही में हमारा समाज ऐसा है?.....क्या अम्माजी जैसी स्त्रियों का समाज में अस्तित्व है?...अगर अपराधी प्रवृत्ति की स्त्रिया हमारे समाज में है, तो क्या क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता?....क्या इस सीरियल को दिखा कर लेखक और टी.वी. चैनल वाले यही कहना चाहते है कि यह सब हंमेशा के लिए ऐसे ही चलता रहेगा? ...इसमे कभी कोई बदलाव आएगा ही नहीं?


...अगर आगे की कहानी में भी अम्माजी कत्लेआम करती ही जाएगी तो औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को दिखाने की क्या जरुरत है?


...सीरियल के सभी कलाकार अपनी अपनी भूमिका के लिए अच्छे है!


.....महेन्द्र सिंह धोनी की क्रिकेट टीम ,भारत का दुनिया में डंका बजा चुकी है...क्रिकेट का 'वर्ल्ड कप ' हमारा हो चुका है!...चारों तरफ खुशियों के परचम लहरा रहे है....ऐसे में नया संवत्सर अपने पावन कदम रख चुका है!...सभी को नवरात्री की ढेरों शुभ-कामनाएं!

Saturday, 19 March 2011

होली आई...होली गई!



...मेरी होली मजेदार रही...और आपकी?







रंगों के बहाने रंगीन सपने...
चित्रित करने आती है होली....
रूठो को मनाने का मौका...
हमें दे जाती है होली....
कुछ भी कह दो, कुछ भी बोलो...
गाली भी लगती है भली...
गुजराती,पंजाबी, मराठी नहीं...
यहाँ मजाक की चलती है बोली...
ढोल.ताशे, मृदंग की थाप पर...
हमें खूब नचाती है होली....

....क्या कहने!...बहुत अच्छा त्यौहार है....खुशी खुशी मनाओ !...और हमने मनाई होली!...मैंने करीबन दस साल के अंतराल के बाद समाज के साथ घुल मिल कर मैंने होली मनाई! बहुत अच्छा अनुभव रहा!

...इस बार समाज में आए हुए बहुत बड़े परिवर्तन को देखा!..होली पक्के और हानिकारक रंगों से नहीं खेली जाती!...और यह देख कर खेली जाती है कि सामने वाला रंग खेलने की मानसिकता लिए हुए है या नही!...कोई अभद्र व्यवहार किसीके साथ नहीं करता... कोई अपशब्दों का प्रयोग भी नहीं करता........मैंने यही सब देखा और लगा कि समाज में वाकई कितना परिवर्तन आ चुका है!...

...दस साल पहले की ऐसी ही होली ने रंगों को बदरंग कर डाला था और आपस के झगड़ो की वजह से पुलिस तक हमारी सोसायटी में बुलाई गई थी!...होली का हूड्दंग आफत बन गया था!

....वैसे हर त्यौहार का अपना एक अलग महत्त्व है...एक अलग कहानी है!...लेकिन खुशी तो हर हर त्यौहार अपने साथ ले कर आता ही है!...होली की मेरे सभी ब्लौगर मित्रों को तहे दिल से बधाई!...सभी ने होली का मजा लूटा ही होगा!

....मैं अपनी उम्र की बात करूं तो यह ६०+ चल रही है!...प्लस कितना करना है, यह मैं आप पर छोड़ देती हूं ....क्यों कि मैं मानती हूँ कि जब तक मेरा दाहिना हाथ कलम चलाता रहेगा मेरी उम्र ६० ही वर्ष की रहेगी और जिस दिन हाथ कलम को छोड़ देगा उस दिन मेरे १०० साल पूरे जाएंगे! जीवन की गाडी अपनी रफ़्तार से चल रही है!


चन्द्र धरती के पास आ रहा है...अब तक फिर दूर जाने की राह पर होगा!...जापान तबाह हो चुका है...पता नही इसका जिम्मेदार चाँद है या नहीं!..कोई 'ना' कह रहा है!...कोई 'हाँ' कह रहा है ...और भी तबाही की आशंकाए जताई जा रही है!
...तो चलिए ,देखें की आगे क्या परोसा जाने वाला है!

अब फिर अपनी बात कहूं तो ....एक नॉवल लिख चुकी हूं...उनकी नजर है हम पर... दूसरा भी लिख चुकी हूं ..लेकिन अभी उसे छपवाने की जल्दी मुझे नहीं है!..लगता है हर काम अपने समय पर खुद- ब-खुद हो जाता है!...हां! प्रतियोगिताओं में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना मेरा बचपन का शौक है ..जो अब तक जारी है!...फिर वह कविता लिखने की प्रतियोगिता हो, कहानी प्रतियोगिता हो, निबंध हो ...या कोई अन्य हो!...बहुत बार जीतने की खुशी मुझे मिली है और हारने की भी मिली है!..जी हां!...मैं हार को भी खुशी मान कर ही गले लगाती हूँ!

....चलिए फिलहाल तो आप सभी होली कैसी मनाई जाए...इस पर विचार विमर्श कर रहे होंगे!..और मुझे पता है कि कुछ ज्यादा स्मार्ट ब्लोगर्स होली मनाने से पहले ही...हमने ऐसे मनाई होली...कहकर मनगढ़ंत कहानी लिखने में मस्त हो गए होंगे!...माफ़ करना मनगढ़ंत कहानिया मैंने भी लिखी है....तो मेरा ऐसा सोचना जायज है कि नहीं?

...तो एक बार फिर ..आप सभी को होली मुबारक हो....












































































































Thursday, 25 November 2010

अलबेला जी की हास्य-व्यंग्य प्रतियोगिता में भाग लें!

अलबेला खत्री जी की हास्य-व्यंग्य प्रतियोगिता हाजिर है!

श्री. अलबेला खत्री जी हास्य कवि है ...लेकिन सिर्फ कविता के माध्यम से ही नहीं... बातों का बतंगड़ बना कर भी हंसाने में ये कवि महाशय माहिर है!...मैंने हाल ही में तिलियार ब्लोगर मेले में इनके द्वारा प्रसारित हास्य की फुआर उडती देखी!....वैसे इन्हों ने, कहते है कि वहां हास्य की गंगा भी बहाई थी.... लेकिन ये साहब जब वहां पहुंचें... लेट ही पहुंचे....तब हम ( मतलब कि मैं और मेरे पति पृथ्वीराज कपूर ) वापसी की ही तैयारी कर रहे थे!...फिर भी आधा घंटा और ठहर गए और इनके सानिंध्य का आनंद उठा ही लिया!... तब बात छिड़ गई थी इनके साथ हुए राखी सावंत की भिडंत की!...हा, हा, हा...

...राखी सावंत के तेवर तो टी.वी.चेनलों का गरम मसाला है ही ! ...लेकिन राखी सावंत को भी अलाबेलाजी ने तीखी हरी मिर्चे चटा दी...सुन कर वहा बैठे सभी वाह वाह कर उठे !...ब्लोगर मेले की असली आप-बिती तो अब राज भाटियाजी सुनाने वाले है!...इन्होने ही इस मेले का भार अपने कंधे पर या कंधों पर उठाया था!....हा, हा, हा!

ताजा समाचार मैं यहाँ दे रही हूँ कि अलबेला खत्री जी ...स्पर्धा क्रमांक -5 का ...हास्य-व्यंग्य प्रतियोगिता का ....आयोजन करने जा रहे है... जैसे कि 1,2,3 और 4 का कर चुके है!...इस बार उनका कहना है कि हास्य-व्यंग्य प्रतियोगियों द्वारा प्रस्तुत किए जाने चाहिए...मतलब कि हंसाने की जिम्मेदारी हम ब्लोगर्स की है...और हंसने की जिम्मेदारी उनकी है!......चाहे कविता हो, गजल हो,लेख हो, कहानी हो, निबंध हो, कार्टून हो ....कुछ भी चलेगा, लेकिन हँसाने में सक्षम होना जरुरी है!....अलबेला जी जरुर हसेंगे ...आप इस स्पर्धा में भाग ले कर तो देखिए...हा, हा, हा!

...एक प्रतियोगी एक ही रचना भेज सकता है! ....रचना भेजने कि अंतिम तारीख 15 दिसंबर है!... इनाम भी देने के लिए उन्होंने तैयार रखे हुए है!...तो Albelakhatri.com पर फ़ौरन दौड़ लगाइए और अपनी क्षमता का परिचय सभी को दीजिये!...हां, हा, हां!

...अगर यह खबर पढ़ कर हंसी आ जाए तो मेरे साथ बेशक ठहाका लगा सकतें है....हा, हा, हा!

Wednesday, 17 November 2010

चिठ्ठाकारों का संमेलन!..ब्लॉग विमर्श!

चिठ्ठाकारों का सम्मलेन!

ब्लॉग को चिठ्ठा कहा जाए तो ब्लोगर्स चिठ्ठाकार अपने आप ही हो गए!...मैंने भी बिना लाग-लपट के कह दिया रचनाजी!....वैसे आपने जिस संमेलन के बारे में लिखा है वह कब और कहाँ हुआ ...इसका पता आपने दिया नहीं है!...खैर!...जाहिर है इस संमेलन का आयोजन आपने नहीं किया था!...तो संयोजक कौन थे?...कृपया बताने का कष्ट करें!...वैसे आपने सारी जानकारी स्पष्ट रूप से दी है, धन्यवाद!

ब्लॉग विमर्श के लिए कुल 10 पॉइंट्स थे!... सभी पॉइंट्स विचारणीय है!

....अब ब्लॉग के जरिए हिंदी का उत्थान देखें तो यह हिंदी भाषा के प्रचार के लिए उत्तम मार्ग है!....जन साधारण को सिर्फ हिंदी पढने के लिए बाध्य कर के...हिंदी का उत्थान नहीं हो सकता!...उनके लिए लिखने की जगह उपलब्ध होना भी जरुरी है!...उन्हें जब लगेगा कि उनका लिखा हुआ पढ़ा जा रहा है, उस पर अन्य पाठक अपनी राय भी दे रहे है...तो वह और ज्यादा लिखेंगे और इस प्रकार हिंदी का प्रचार आगे बढेगा!..ब्लॉग लेखन इस प्रकार हिंदी भाषा को समृद्ध बना रहा है!

....हिंदी ब्लॉग से कमाई ....इस पॉइंट पर विचार करें तो परिणाम फिल हाल शून्य ही सामने आ रहा है!...और इसी वजह से जैसा कि एक अन्य पॉइंट है....ब्लोगरों कि संख्या घटती जा रही है! अपना बहुमूल्य समय ब्लॉग लिखने में खर्च करना हर किसी के बस की बात नहीं है!... जिन ब्लोगर्स का कमाई का अन्य जरिया बेहतरीन होता है, वही हिंदी ब्लॉग लिखने में रूचि लेते है!... मुझे लगता है मेरे इस विचार से सभी ब्लॉगर्स सहमत होंगे!...अब यह काम उस वेब-साईट का है जो हिंदी ब्लॉग्स के लिए ब्लोगर्स को आमंत्रित कर रहे है!

...ब्लॉग पर साहित्य का सृजन...यह भी एक ध्यान खिंचने वाला पॉइंट है!...माना कि हर लिखने वाला साहित्यिक नहीं होता!...लेकिन अगर कोई साहित्यिक ब्लॉग लिखने पर आमादा हो जाता है तो जाहिर है कि वह सभी के ध्यान अपनी तरफ खिंचता है!...उसकी कलम में यह शक्ति होती है!...लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अन्य ब्लोगर्स हीन भावना का अनुभव करें और पीछे हटें!...इसका अच्छा उदाहरण हमारी फिल्म इंडस्ट्री है!...अमिताभ बच्चन,शाहरुख खान, अक्षय कुमार जैसे बड़े कलाकारों के चलते हुए भी साधारण कलाकारों की तूती बज रही है!... अब साधारण कलाकारों की सूची आप स्वयं तैयार कर सकतें है!... बड़े नामी सिंगर्स के होते हुए भी छोटे सिंगर्स की मांग कम नहीं है!....तो इस बारे में यही कहना है कि ब्लॉग लिखने के लिए साहित्यिक होना जरुरी नहीं है...अपने विचार स्पष्ट रूप से लिख कर व्यक्त करने की कला ही पर्याप्त है!.

गुट बाजी :समीर और अनूप की... यह पॉइंट कैसे दर्ज हुआ यह समझ में नहीं आ रहा!... मैं समझती हूँ कि इस प्रकार की कोई गुट बाजी यहाँ नहीं है!

ब्लॉग पर पाठक बढ़ सकतें है!...ब्लोगर्स की संख्या बढ़ने के साथ साथ ही पाठकों की संख्या भी बढ़ सकती है!...इसके लिए ब्लोगर्स के लिए पारिश्रमिक उपलब्ध होना जरुरी है!...कैसे?...इसके लिए अलग से विमर्श होना चाहिए!..सभी ब्लोगर्स अपनी राय दें...अगर बोलने का मौका नहीं मिलता तो लिख कर अपने विचार सब के सामने रख सकतें है!

रचना जी को मैं यहाँ धन्यवाद देना चाहूंगी!....आपने बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित किया है!...


Tuesday, 31 August 2010

ए. आर. रहमान का संगीत और बवंडर!

एक कलाकार ही तो है... ए.आर. रहमान!

......एक वह दिन भी था जब संगीतकार ए. आर. रहमान को हमी लोगों ने सिर पर उठाया था!... उन्हें महान संगीतकार का दर्जा दिया था!...क्यों कि उन्हों ने तब ऑस्कर अवार्ड भारत की झोली में डाला था! ...तब हमें लगा था कि ये तो देश का गौरव है...देश की शान है.....इनका कद तो बहुत उंचा है!

....और आज यही संगीतकार हमें बौना नजर आ रहा है!...क्यों कि कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए तैयार किया गया उनका गीत... 'ओ...यारो ये इंडिया ...बुला लिया!' ....कुछ बड़े लोगों को पसंद नही आया!....छोटे लोगों को पसंद आया कि नही... यह कौन पूछने जाता है!

.... बात १५ करोड़ रुपयों की मांग की भी है!...कहते है की उन्हें साढ़े पांच करोड़ दिए गए है!... ये बात तो अंदर की है!... वैसे उन्हें कुछ भी देने की जरुरत नही थी! ....अगर कॉमनवेल्थ गेम्स देश के लिए हो रहे है तो ...देश के लिए काम करने वाले किसी को भी मेहनताना नही मिलना चाहिए!....फिर ए. आर. रहमान को ही क्यों साढ़े पांच करोड़ रुपये दिए गए?

...चलो दे भी दिए...तो उन्होंने जो भी संगीत दिया उसे अच्छा मान कर स्वीकार कर लेना चाहिए!.... आपने उन्हें गीत-संगीत का जिम्मा सोंपा था... जो उन्होंने निभाया!.....उनकी शकीरा के संगीत से तुलना किसलिए की जानी चाहिए?... रही बात हिंदी की!.... गलती ही निकालनी है तो हिंदी के किसी भी गाने की कहीं से भी निकाली जा सकती है!.... इंग्लिश गानों की भी निकाली जा सकती है!... यहाँ साहित्य की कड़ी परीक्षा नही हो रही....यह नजर-अंदाज करने वाली बात है!


...और ध्यान देने वाली एक बात यह भी है कि ....हर कलाकार अपनी दूसरी कृति , पहली कृति से भिन्न ही बनाएगा!... दूसरी कृति में पहलेवाली कृति की अपेक्षा करना गलत है! ...यही बात ए. आर. रहमान की रचना को भी लागू होती है!

.....मुझे लगता है कि इस बात को ले कर बवंडर उठाना ठीक नही है!

Friday, 6 August 2010

एक उपन्यास' उनकी नजर है हम पर!'

' उनकी नजर है..हम पर ' का लोकार्पण!

कुछ दिनों के अवकाश के बाद मैं लौट आउंगी !... एक बहुत जरुरी काम आ पड़ा है!...ऐसा कई बार हुआ है!...मैं छुट्टी ले कर यहां से गई भी हूँ और वापस आई भी हूँ! !...मेरे साथी ब्लोगर्स भी ऐसा ही कर रहे है! ....मेरी नजर है ...उन पर!

...जाते जाते बता कर जा रही हूँ कि मेरे द्वारा लिखित उपन्यास का नाम है 'उनकी नजर है ..हम पर! ' इस का 11 अगस्त 2010 के रोज लोकार्पण होने जा रहा है!... यह उपन्यास परग्रहियों का हमारी धरती पर उतर आने से संबधित है!... खैर! परग्रहियों को मैंने, आपने या विदेशियों ने भी अब तक देखा नही है; इसके बावजूद भी उनके बारे में बहुत कुछ कहा गया है, लिखा गया है और फिल्में भी बनाई गई है!..

...मेरी कल्पना ,अब तक की परग्रहियों के बारे में की गई कल्पना से अलग है!... इस उपन्यास के परग्रही टेढ़ी-मेढ़ी शकलों वाले, नाटे , मोटे ...... लाल, नीले या हरे रंग के नही है! ... वे उपरसे दिखने में तो हम जैसे ही है ...लेकिन हमारे से अलग किस तरह से है...इसका वर्णन इस उपन्यास में मिलेगा... वे किस ख़ास काम से यहां आए हुए है इसका भी खुलासा होगा!...वे हम से दोस्ती भी निभाएंगे और दुश्मनी भी!

इस उपन्यास को हिन्दयुग्म प्रकाशन का सहयोग प्राप्त हुआ है!... श्री शैलेश भारतवासी प्रकाशक है!... सच पूछो तो शैलेशजी की ही मेहनत के परिणाम स्वरूप इस उपन्यास को 'लोकार्पण ' का सौभाग्य प्राप्त हुआ है!

.... मैं तो बस! झोली फैलाए...आप सभी से शुभ-कामनाएँ मांग रही हूँ! ... ऊपर वाले से प्रार्थना कीजिए कि मेरी इस रचना को सफलता की सीढियाँ चढ़ना नसीब हो!

...मैं यहां आप सभी के लिए प्रार्थना करती हूँ कि आप को अपने इच्छित कार्य में ज्वलंत सफलता मिलें!

Saturday, 31 July 2010

किसीकी प्रशंसा करने में कंजूसी क्यों?

प्रशंसा किसे नही पसंद?

मुझे लगता है... किसी की प्रशंसा करना भी एक कला है,एक आर्ट है, या समझ लीजिए की एक गुण है!...इस गुण से सभी परिपूर्ण बेशक नहीं होते...लेकिन इस गुण को आत्मसात करना कोई कठिन काम नहीं है!...कुछ लोग कहते है कि ' मुझे किसीकी चमचागिरी करने की आदत नहीं है!... '

...चलिए मान लेते है कि आपकी यह आदत अच्छी है ...लेकिन इस आदत के चलते आपको कब कब, कहां कहां और कितना नुकसान उठाना पड़ा है... ज़रा बताएंगे आप? ...और फिर किसी की प्रशंसा करना चाटुकारी या चमचागिरी कैसे हुई?... किसी के लिए दो अच्छे शब्द बोल दिए, तो इससे आपकी प्रतिष्ठा पर आंच आने का सवाल पैदा ही नहीं होता!

... यहाँ मेरे साथ घटी एक घटना पेश करने जा रही हूं! जो प्रशंसा से ही संबंधित है!

......मेरे पड़ोस में एक परिवार रहता है... यह खन्ना परिवार है ..सास, ससुर, बेटा और बहू! ... बहू का पांच महीने का छोटासा बच्चा भी है! ... ऐसे ही दोपहर के समय मैं उनके घर चली गई!... वैसे दिल्ली जैसे महानगर में पास- पड़ोस में जा कर बतियाने का रिवाज तो खत्म सा हो गया है!... सभी अपने में मस्त होते है!... पॉश कोलोनिज में तो और भी बुरा हाल है!...कई कई दिनों या महीनो तक पता भी नहीं चलता कि आपके सामने वाले फ़्लैट में कौन रह रहा है!

... तो मैं खन्नाजी के यहां चली गई!... मेरा मिसेस खन्ना ने तहे दिल से स्वागत किया !... मैंने उनका और उन्होंने मेरा हालचाल पूछा!,,,, बहू बेडरूम में थी; उसे भी मिसेस खन्ना ने बाहर बैठक में बुलाया ...वह अपने छोटे बच्चे को ले कर आ गई और सोफे पर मेरे साथ बैठ गई! ...मिसेस खन्ना इतने में चाय वगैरा ले कर आ गई!...इधर उधर की बातों का सिलसिला जारी था!

" देखिए बहनजी! मेरी बहू ने पोते को कितनी अच्छी तरह से संभाला हुआ है!... उसकी देखभाल यह बहुत ही अच्छे तरीके से करती है.... बच्चे की मालिश , उसे नहलाना-धुलाना , समय पर दूध पिलाना, उसकी दवाइयाँ वगैरे का ध्यान रखना .... मुझे तो कुछ कहना ही नहीं पड़ता!" मिसेस खन्ना अपनी बहू की भूरी भूरी प्रशंसा कर रही थी!
अब बोलने की बारी बहू की थी! वह कहने लगी!
" आंटी!...डिलीवरी के बाद होस्पिटल से छुट्टी मिलने के बाद , मैं मायके ही गई थी!... वहां मैं सवा महीना रही !... मेरी मम्मी ने मेरे लिए मालिश वाली बाई लगवाई थी ... वह मेरी और मेरे बच्चे की मालिश करती थी! ... मेरी मम्मी मेरा बड़ा ही ध्यान रखती थी!... मेरी पसंद की चीजे बना कर खिलाती थी ....वहीँ से मैं सब सीख कर आई कि बच्चे को कैसे संभाला जाता है!"

...बहू ने बिच में एक बार भी अपनी सास का नाम नहीं लिया!... वह कह सकती थी कि 'सासू माँ की मदद ले कर ही मैं बच्चे की अच्छे से देखभाल कर पा रहीं हूँ!...

....मैं जानती थी कि बहू सिर्फ अपने बच्चे के साथ दिन भर अपने बेड-रूम में बंद रहती थी !... चाय बनानी या पानी का गिलास भी वह उठाती नहीं थी! घर में खाना बनाने से ले कर और घर-गृहस्थी के सारे काम सास याने कि मिसेस खन्ना ही करती थी!... सुबह से ले कर रात के ग्यारह बजे तक उसका काम चलता ही रहता था!...ऐसे में अगर बहू अपनी सास के लिए प्रशंसा के दो बोल बोल देती तो उसका क्या बिगड़ने वाला था?

..... यह बात मुझे ही नहीं , मिसेस खन्ना को भी चुभ गई!...क्यों कि बाद में बातों का सिलसिला ठंडा पड़ गया!... भारी मन से मैंने विदा ली और अपने घर वापस आ गई!.......न जाने लोग ऐसा क्यों करते है?... मैं सोच रही थी!...मिसेस खन्ना ने अपने बहू की प्रशंसा ही की थी!... क्या बहू का फर्ज नहीं बनता था कि बदले में ही सही...अपनी सास के लिए कुछ मीठे शब्दों का इस्तेमाल करे?...

.....किसीकी प्रशंसा करने के लिए पैसे तो खर्च नहीं करने पड़ते...फिर लोग दूसरों की प्रशंसा करने में कंजूसी क्यों बरततें है?... जब हम भगवान, अल्लाह या क्राइस्ट के सामने जाते है , तब भी पहले उसकी प्रशंसा करते है कि वह दाता है, महान है , शक्तिमान है , तारणहार है...वगैरा वगैरा!... इसके बाद उससे जो मांगना है, मांगतें है! ... फिर मनुष्य के लिए यह बात क्यों नहीं सोचतें कि प्रशंसा का भूखा तो मनुष्य भी है!

Monday, 12 July 2010

है किसीके पास ऑक्टोपस?

हास्य-व्यंग्य ..भाईसाहब को ऑक्टोपस चाहिए....

....क्या है कि भाई साहब अब मेरे पड़ोस में रहने आ गए है... पहले दो गलियाँ छोड़ कर रहा करते थे..मकान भी अपना ही था ....लेकिन उनका अपने किराएदार से झगडा हो गया...उन्हों ने सोचा कि' इतना अच्छा , शरीफ और मोटी रकम किराए के तौर पर देने वाला किरायेदार ...दीया ले कर ढूंढने से शायद मिल भी जाए... लेकिन इतना कष्ट करे कौन?... इससे अच्छा है खुद ही किराए के मकान में शिफ्ट किया जाए!...'

.....मेरी ग्रहदशा उस समय अच्छी नहीं चल रही थी... पड़ोस के मकान से जैसे ही सामान अगले दरवाजे से बाहर जा रहा था...पिछले दरवाजे से भाई साहब का सामान अंदर दाखिल हो रहा था!... यह तो तब पता चला जब अंत में भाई साहब अपनी नेम-प्लेट बाहर टांग रहे थे...और हम पतिदेव के साथ सब्जी खरीदने बाजार जा रहे थे!

"चलो अच्छा ही हुआ कि हम आप के पड़ोस में आ गए!" भाई साहब मेरी तरफ देख कर बोले जो मेरे पतिदेव को जरा भी नहीं सुहाया!
" पता नहीं मैंने सुबह सुबह किसका मुंह देखा था... " पतिदेव दरवाजे पर ताला मढ़ते हुए बोले!
" अजी साहब!... मेरा भी दिन खराब ही रहा... मेरा अपना मकान मुझे खाली करना पड़ा.... मेरे किरायेदार को मैंने अपनी पत्नी के साथ बतियाते हुए रंगे हाथो पकड़ लिया... क्या ज़माना आया है...क्या बताऊ?" ..कहते हुए भाईसाहब मेरे नजदीक आए और मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए मेरे पतिदेव को आगे की कहानी सुनाने लगे...
...मैंने घुर कर देखा तो उन्हों ने हाथ हटा लिया और आगे की कहानी अधुरी रह गई!

...और आज तो सुबह सुबह भाई-साहब के शोर- शराबे से ही नींद खुल गई!
हम क्या हुआ..देखने के लिए दरवाजा खोल कर बाहर निकले तो पता चला कि भाईसाहब का झगडा दूधवाले से हो रहा था!

" बड़ा ही बेशर्म है रे तू!.... तूने मेरा हाथ पकड़ा ही क्यों? ... इसका मतलब तू रोज ही मेरी पत्नी का हाथ पकड़ता है?...और क्या क्या करता है रे निर्लज्ज?" भाई साहब चिल्ला चिल्ला कर दूधवाले की खाट खड़ी कर रहे थे!

..हमने और वहां इकठ्ठे हुए दूसरे पड़ोसियोंने देखा कि भाई साहब,.. पत्नी का पीले रंग का लाल फूलों वाला गाउन पहने हुए है... हमारा हंसने का मन भी हुआ लेकिन मामला कुछ गंभीर लगा तो हंसी को अंदर ही समेट लिया!...पूछने पर पता चला कि उनका नाईट-गाउन बारिश कि वजह से सुखा नहीं था सो उन्होंने पत्नी का गाउन पहन लिया था और आज पत्नी की जगह खुद दूध लेने पतीला ले कर दूध वाले के सामने आ गए थे!

...दूधवाला भी गुस्से से लाल पिला हो कर बता रहा था कि " भाई साहब के हाथ से , दूध से भरा पतीला छूटने ही वाला था... इसलिए मैंने आगे बढ़ कर उनका हाथ पकड़ लिया और पतीले को गिरने से बचा लिया!... मैं कसम खाता हूँ अपनी भैस की... एक पैसे का भी झूठ बोला तो मेरी भैस नरक में जाए! "

" सच बोल अबे!... तूने मुझे जनानी समझा था या नहीं?... जनानी समझ कर मेरा हाथ पकड़ा था या नहीं?... " भाई साहब ने आवाज और ऊँची कर दी!

" अँधा हूँ मैं?...मुझे दिखाई नहीं देता....शेर की खाल ओढने से गधा शेर नहीं दिखता!... मैंने जनानी समझ कर नहीं बल्कि भाईसाहब समझकर ही आप का हाथ पकड़ा था!" दूधवाले ने अब मूंछो पर ताव दिया!

" अभी पता चल जाएगा!... अभी इसी जगह दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा"....कहते हुए भाई साहब जमा हुए हम पड़ोसियों की तरफ घुमे...और ख़ास लहजे में बोले...

" अजी है किसी के पास ऑक्टोपस?... अभी फैसला हो जाएगा...ऑक्टोपस बता देगा कि दूधवाले ने मेरा हाथ जनाना समझ कर पकड़ा था या मर्द समझकर !..."

" ...लेकिन कैसे बताएगा ऑक्टोपस?" मैंने शंका जताई!

" सीधी सी बात है ... ये आपका हाथ है और ये मेरा हाथ है... अगर ऑक्टोपस ने आप के हाथ की तरफ इशारा किया तो समझ लीजिए कि दूधवाले ने मेरा हाथ ...मेरी पत्नी का हाथ समझ कर पकड़ा था...फिर मैं उसकी धुनाई करूँगा .... और अगर ऑक्टोपस ने मेरे हाथ की तरफ इशारा किया तो दूधवाले को राहत मिल सकती है!"

" ये रही आपकी पत्नी..इसका हाथ पकडिये और मेरी पत्नी का छोड़ दीजिये !" मेरे पति अब तक अंदर सो रही भाईसाहब की पत्नी को जगा कर बाहर ले आए !...और " मैं ऑक्टोपस लेने जा रहा हूँ..." कहते हुए चले गए...

...तीन घंटे हो चले है ..लेकिन मेरे पति अब तक ऑक्टोपस ले कर लौटे नहीं है!

Friday, 18 June 2010

हंसने वाले के साथ..सब हँसते है!

हंसने वाले के साथ...सब हँसतें है!


...एक जमावड़ा था... किसी लड़की की एंगेजमेंट किसी लडके से होने जा रही थी... हम भी उस जमावड़े में आमंत्रित थे!....खाने-पीने के साथ बातों का दौर भी चल रहा था!... बात हंसने और रोने के बारे में चल पड़ी!...किसी भाईसाहब ने कहा..'अजी , हंसने वाले के साथ सब हंसते है..लेकिन रोने वाले के साथ कोई नहीं रोता!' ...भाई साहब का साथ देते हुए दूसरे भाई साहब और बहनजी ने 'हाँ जी!' ..'हाँ जी' ..कहना शुरू कर दिया! इस पर हमें क्रोध आया!...क्यों कि ऐसा कहते हुए उन भाई साहब ने हमारे कंधे पर अपना हाथ रखा दिया ! हमने उनका हाथ पकड़ कर हटाते हुए कहा..." ऐसा कुछ नहीं है...रोने वालों के साथ रोने वाले भी बहुतेरे होते है!"
इस पर भाई साहब अपनी बात पर अड़ गए ' रोने वालों के साथ कोई नहीं रोता!'

"...नहीं जी ऐसा थोड़े ही होता है?... आप रो कर तो देखिएं!..लोग आपके साथ रोना शुरू कर देंगे! ' हमने भाईसाहब की बात काटने के लिए ऐसा कहा!
" वैसे आप रोए कब थे... " हमने चुटकी ली!
' भला मैं क्यों रोने लगा?... मुझे तो रोना आता ही नहीं है .. मैं बस एक बार रोया था !" कहतें हुए भाई साहब ने फिर मेरे कंधे पर हाथ रखा...फिर मैंने उनका हाथ झटक दिया... लेकिन एकदम से भाई साहब चिल्लाएं.... "ओये!...मर गया रे !"... मैंने देख ही लिया की भाई साहब की भारी भरख़म श्रीमती ने उनका वही हाथ जोर से मरोड़ा था!

... अब सभी लोगों का ध्यान इस तरफ था... कि यहाँ क्या हुआ!

...भाई साहब... 'कुछ नहीं..युंही जरा... हे, हे, हे '... करने पर उतर आए!

" हाँ जी भाईसाहब आप रोएँ कब थे?" अब की बार मैंने फिर पूछा...

" जब मेरे गले में श्रीमती वरमाला डाल रही थी!..तब दहाड़े मार कर रोया था मैं!...लेकिन तब लोगों ने जोर जोर से हँसना शुरू किया था जी...रोया तो कोई नहीं था! " पत्नी की तरफ देखते हुए भाईसाहब बोले..इस समय पत्नी जरा दूर खड़ी थी!... नहीं तो फिर उनके चिल्लाने की आवाज दुगुनी रफ्तार से आती!
" भाई साहब रोने वाले के साथ रोने वालों को हम फिर कभी ढूंढेंगे.... अभी आप अपनी कोई ताजा कविता ही सुना दीजिए!".....भीड़ में से कोई बोला!
भाई साहब अपने आप बहुत उच्च कोटी का कवि समझतें है, यह मुझे मालूम था!... मैंने भी आँखे मटकाकर कहा ' सुनाइए न!' ....और भाई साहब की बांछे खिल गई!
..." सुनिए, सुनिए..मेरी बिलकुल ताजा कविता.... आप को अंदर तक हिला कर रख देगी ... कविता का शीर्षक है.....' सूनी सड़क पर...."

.....और वे अपनी रोत्तल आवाज में कविता सुनाने लग गए...उनकी पत्नी फ़ौरन वहां से दफा हो गई .... शायद पत्नी को भगाने के लिए वह हंमेशा यही नुस्खा इस्तेमाल करतें होंगे!

रफ्ता, रफ्ता...

एक साइकिल...
सड़क पर...


जाती हुई...





मेरी नज़रों से...

हुई ओझल...

क्यों कि मैं....

उस समय ...

jaa रहा था....

बिलकुल अकेला...

और पैदल...

सूनी सड़क पर...

मेरे सामने से...

तेज रफ़्तार...

लाल रंग की कार...

गुजर गई...

मुझे धक्का दे कर...

गिरा दिया...

सूनी सड़क पर....

मैं गिरा...

मैं उठा,

मैं खड़ा हुआ...

मैंने झाडे कपडे....

करता और क्या...

सूनी सड़क पर....

मुझे लगा...

जनम जनम से....

भिखारी हूँ मैं...

बुद्धू भी हूँ मैं...

वरना...

रेलवे-स्टेशन

और मंदिर छोड़कर...

कटोरा लिए हाथमें...

यहाँ क्यों भटकता...

सूनी सड़क पर...

वह साइकिल वाला...

कमबख्त...

फिर आया...

छिना कटोरा मेरा...

फिर हुआ नज़रों से ओझल...

अब मैं बैठा...

सिर पकड़ा...

जार, जार, रोया...

सूनी सड़क पर...

अब बिना कटोरे...

भिखारी!

कौन कहेगा मुझे...

कौन देगा भीख...

भूखा ही मर जाऊँगा...

राम तेरी माया...




अब समझ में आया.....

आंसू बहाता ,

जा रहा हूँ मैं...

सूनी सड़क पर....

...भाई साहब रोए जा रहे थे...शायद वह अपने आप को वही कविता वाला भिखारी ही समझ रहे थे!... कुछ लोग रोने में उनका साथ दे रहे थे!... माहौल गंभीर हो गया था... कि मैंने चुटकी ली....
" भाई साहब मैंने कहा था न कि रोने वाले के साथ भी लोग रोते है?"
...अब भाई साहब मेरी तरफ सरके...वे भिखारी के चोले से बाहर आ गए और फिर एक बार मेरे कंधे पर हाथ रखा!... मैंने फिर उनका हाथ झटक दिया...क्यों कि उनकी श्रीमती आँखे लाल किए बिलकुल सामने खड़ी थी!