Friday, 18 June 2010

हंसने वाले के साथ..सब हँसते है!

हंसने वाले के साथ...सब हँसतें है!


...एक जमावड़ा था... किसी लड़की की एंगेजमेंट किसी लडके से होने जा रही थी... हम भी उस जमावड़े में आमंत्रित थे!....खाने-पीने के साथ बातों का दौर भी चल रहा था!... बात हंसने और रोने के बारे में चल पड़ी!...किसी भाईसाहब ने कहा..'अजी , हंसने वाले के साथ सब हंसते है..लेकिन रोने वाले के साथ कोई नहीं रोता!' ...भाई साहब का साथ देते हुए दूसरे भाई साहब और बहनजी ने 'हाँ जी!' ..'हाँ जी' ..कहना शुरू कर दिया! इस पर हमें क्रोध आया!...क्यों कि ऐसा कहते हुए उन भाई साहब ने हमारे कंधे पर अपना हाथ रखा दिया ! हमने उनका हाथ पकड़ कर हटाते हुए कहा..." ऐसा कुछ नहीं है...रोने वालों के साथ रोने वाले भी बहुतेरे होते है!"
इस पर भाई साहब अपनी बात पर अड़ गए ' रोने वालों के साथ कोई नहीं रोता!'

"...नहीं जी ऐसा थोड़े ही होता है?... आप रो कर तो देखिएं!..लोग आपके साथ रोना शुरू कर देंगे! ' हमने भाईसाहब की बात काटने के लिए ऐसा कहा!
" वैसे आप रोए कब थे... " हमने चुटकी ली!
' भला मैं क्यों रोने लगा?... मुझे तो रोना आता ही नहीं है .. मैं बस एक बार रोया था !" कहतें हुए भाई साहब ने फिर मेरे कंधे पर हाथ रखा...फिर मैंने उनका हाथ झटक दिया... लेकिन एकदम से भाई साहब चिल्लाएं.... "ओये!...मर गया रे !"... मैंने देख ही लिया की भाई साहब की भारी भरख़म श्रीमती ने उनका वही हाथ जोर से मरोड़ा था!

... अब सभी लोगों का ध्यान इस तरफ था... कि यहाँ क्या हुआ!

...भाई साहब... 'कुछ नहीं..युंही जरा... हे, हे, हे '... करने पर उतर आए!

" हाँ जी भाईसाहब आप रोएँ कब थे?" अब की बार मैंने फिर पूछा...

" जब मेरे गले में श्रीमती वरमाला डाल रही थी!..तब दहाड़े मार कर रोया था मैं!...लेकिन तब लोगों ने जोर जोर से हँसना शुरू किया था जी...रोया तो कोई नहीं था! " पत्नी की तरफ देखते हुए भाईसाहब बोले..इस समय पत्नी जरा दूर खड़ी थी!... नहीं तो फिर उनके चिल्लाने की आवाज दुगुनी रफ्तार से आती!
" भाई साहब रोने वाले के साथ रोने वालों को हम फिर कभी ढूंढेंगे.... अभी आप अपनी कोई ताजा कविता ही सुना दीजिए!".....भीड़ में से कोई बोला!
भाई साहब अपने आप बहुत उच्च कोटी का कवि समझतें है, यह मुझे मालूम था!... मैंने भी आँखे मटकाकर कहा ' सुनाइए न!' ....और भाई साहब की बांछे खिल गई!
..." सुनिए, सुनिए..मेरी बिलकुल ताजा कविता.... आप को अंदर तक हिला कर रख देगी ... कविता का शीर्षक है.....' सूनी सड़क पर...."

.....और वे अपनी रोत्तल आवाज में कविता सुनाने लग गए...उनकी पत्नी फ़ौरन वहां से दफा हो गई .... शायद पत्नी को भगाने के लिए वह हंमेशा यही नुस्खा इस्तेमाल करतें होंगे!

रफ्ता, रफ्ता...

एक साइकिल...
सड़क पर...


जाती हुई...





मेरी नज़रों से...

हुई ओझल...

क्यों कि मैं....

उस समय ...

jaa रहा था....

बिलकुल अकेला...

और पैदल...

सूनी सड़क पर...

मेरे सामने से...

तेज रफ़्तार...

लाल रंग की कार...

गुजर गई...

मुझे धक्का दे कर...

गिरा दिया...

सूनी सड़क पर....

मैं गिरा...

मैं उठा,

मैं खड़ा हुआ...

मैंने झाडे कपडे....

करता और क्या...

सूनी सड़क पर....

मुझे लगा...

जनम जनम से....

भिखारी हूँ मैं...

बुद्धू भी हूँ मैं...

वरना...

रेलवे-स्टेशन

और मंदिर छोड़कर...

कटोरा लिए हाथमें...

यहाँ क्यों भटकता...

सूनी सड़क पर...

वह साइकिल वाला...

कमबख्त...

फिर आया...

छिना कटोरा मेरा...

फिर हुआ नज़रों से ओझल...

अब मैं बैठा...

सिर पकड़ा...

जार, जार, रोया...

सूनी सड़क पर...

अब बिना कटोरे...

भिखारी!

कौन कहेगा मुझे...

कौन देगा भीख...

भूखा ही मर जाऊँगा...

राम तेरी माया...




अब समझ में आया.....

आंसू बहाता ,

जा रहा हूँ मैं...

सूनी सड़क पर....

...भाई साहब रोए जा रहे थे...शायद वह अपने आप को वही कविता वाला भिखारी ही समझ रहे थे!... कुछ लोग रोने में उनका साथ दे रहे थे!... माहौल गंभीर हो गया था... कि मैंने चुटकी ली....
" भाई साहब मैंने कहा था न कि रोने वाले के साथ भी लोग रोते है?"
...अब भाई साहब मेरी तरफ सरके...वे भिखारी के चोले से बाहर आ गए और फिर एक बार मेरे कंधे पर हाथ रखा!... मैंने फिर उनका हाथ झटक दिया...क्यों कि उनकी श्रीमती आँखे लाल किए बिलकुल सामने खड़ी थी!







































Monday, 14 June 2010

बड़ी उम्र में मातृत्व!

स्त्रियों पर अत्याचार इस ढंग से भी ज़ारी है..
क्या कहने!...आज ही सुबह अखबार में पढ़ा...हिसार के सातरोड़ क्षेत्र में रहने वाली 66 वर्षीया भतेरी देवी ने तीन बच्चों को ... तिडवा ...बच्चों को जन्म दिया! अखबार के लिए भले ही यह खबर सनसनी जगाने वाली हो!... लेकिन एक स्त्री होने के नाते मुझे यह खबर विचलित करने के लिए पर्याप्त है!



...अब देखिए!... इसी अखबार में लिखा हुआ है कि भतेरी देवी को संतान प्राप्ति शादी के बाद कुछ वर्षों तक न होने की वजह से इनके पतिदेव ने दूसरी शादी रचाई... दूसरी पत्नी को भी संतान न होने के हालात में इस पतिदेव ने तीसरी शादी रचाई... नतीज़ा फिरभी शून्य रहा !.... इसके बाद ये हुआ कि इस पति महाशय की बाद की दोनों पत्नियां इनसे अलग हो गई!... और पहली पत्नी भतेरी देवी इनके साथ रहने लगी!... यह भी हो सकता है कि अब बुढ़ापा कैसे कटेगा सोच कर ही पतिदेव ने पहली पत्नी के साथ रहना शुरू कर दिया!...



...अब 66 साल के पति- पत्नी संतान के लिए कितने आशान्वित हो सकते है? ...फिरभी देखिये भतेरी देवी का इलाज चलता रहा और नैशनल फर्टिलिटी के डॉ अनुराग मिश्र ने उन्हें इस उम्र में मातृत्व दिलाया!



.... अब इस उम्र में तीन नवजात बच्चों की ...दो बेटे और एक बेटी की ...जिम्मेदारी भतेरी देवी कैसे उठा सकती है?.... उसका शरीर क्या इस उम्र के मातृत्व के लिए तैयार हो सकता है?... उसके पतिदेव तो चलिए इस उम्र में पिता बनकर ठाठ से घुम रहे है!... क्या इस उम्रमें पिता बनने में उन्हें कोई शारीरिक कष्ट हुआ या आगे होने वाला है?... भतेरी देवी के लिए बच्चों के जन्म से ले कर... आगे भी शारीरिक कष्टों की कमी नहीं है! ... इनके पतिदेव ने क्या यह सब सोचा?



... और भी इसी सन्दर्भ में एक उदाहरण है.... जींद की 70 वर्षिया राजोदेवी ने भी इसी सेंटर से , इस उम्र में मातृत्व प्राप्त किया!....



ऐसी खबरें अखबार वाले और असंभव को संभव बनाने वाले डॉक्टरों के लिए गर्व से सिर ऊँचा करने वाली है!... लेकिन उन स्त्रियों के बारे में भी तो सोचना चाहिए जिन्हें इतनी बड़ी उम्र में माताएं बनने के लिए मजबूर किया जाता है!.... मेरी निजी राय है कि बड़ी उम्र में भी मातृत्व अगर प्रदान करना हो तो भी... स्त्री की उम्र 50से ज्यादा न हो इस बात का ख़ास ध्यान रखा जाना चाहिए और यह नेक काम एक डॉक्टर ही कर सकता है!... स्त्रियों पर इस प्रकार से होनेवाला अत्याचार रोका जा सकता है!





Tuesday, 8 June 2010

विज्ञापनों की भी अहमियत होती है!

मेरे ब्लॉग पर...विज्ञापन अंगडाइयाँ ले रहे है!

जी हाँ!... मैंने अपने ब्लॉग पर विज्ञापनों के लिए दरवाजे खोले हुए है!...
मुझे किसीने ई-मेल भेज कर जानना चाहा कि...." क्या आपकी धन कमाने की मनसा है, जो आपने विज्ञापनों को अपने ब्लॉग पर पनाह दी हुई है?"

.... उन महाशय को अलग से जवाब मैं दे सकती थी...लेकिन मैंने सोचा कि और भी कई साथी ब्लोगर्स यही सोच रहे होंगे ...लेकिन पूछने से कतरा रहे होंगे!...तो चलिए ब्लॉग लिख कर ही इसका खुलासा किया जाए!...

... सबसे पहली बात यह कि जो ब्लोगर्स कई सालों से हिंदी में ब्लॉग्स लिख रहे है वे अपना अनुभव बताते हुए कहते है कि ' हिंदी ब्लॉग्स द्वारा धन कमाना...रेत में से तेल निकालने के बराबर है! अपने पास रोजी-रोटी का अच्छा इंतजाम हो; तभी हिंदी ब्लौगिंग की तरफ मुड़ना चाहिए!... कमाई करने का इरादा हो तो, इंग्लिश में ब्लॉग लिखकर कमाई की जा सकती है! '

.... विज्ञापनों द्वारा भी कमाई करने के लिए फिरंगी भाषा का चोला ....मन माने या न माने...ओढ़ना पड़ता है!

... अब मेरे जैसे हिंदी की दिन-रात पूजा करने वाले ब्लॉगर्स ; फिरंगी भाषा का टिका तो माथे पर लगाएंगे नहीं!... कमाई करने की सोचना तो बहुत दूर की बात है!... रही विज्ञापनों को अपने ब्लॉग पर चिपकाने की बात!... तो मैं महज ब्लॉग की सजावट के लिए विज्ञापनों का इस्तेमाल कर रही हूँ! .... वैसे विज्ञापनों को मैं बुरा नहीं मानती!...किसी को कोई खरीदारी करनी हो तो वह जानकारी कहांसे हासिल करेगा?... या किसी को कोई चीज बेचनी हो तो वह क्या करेगा?... आज के जमाने में विज्ञापन की बहुत अहमियत है!

.... मुझे अब तक विज्ञापनों से कोई कमाई हुई नही है... न ही होगी!... लेकिन विज्ञापनों को मैं पनाह देती रहूंगी!... मैं पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर हूँ ..और अब सिर्फ और सिर्फ हिंदी लेखन कार्य में व्यस्त हूँ! ...मेरा शौक हिंदी लेखन की प्रतियोगिताओं में भाग लेना भी है! अपनी चल-अचल संपत्ति के बारे में या विदेश यात्राओं के बारे में चर्चा करने की ये जगह नहीं है!... इसे अन्यथा भी लिया जा सकता है!

.... फिर एक बार कहने की गुस्ताखी करती हूँ की अपने ब्लॉग पर विज्ञापन मैं सजावट के लिए दे रही हूँ! ... मेरी कम्प्यूटर संबधित जानकारी मर्यादित है; फोटो या अन्य सामगी का सजावट के लिए इस्तेमाल करना मेरे बस की बात नहीं है!...

....हो सकता है बहुतसे ब्लॉगर्स मेरी ही तरह सोचते हुए विज्ञापनों को अपने ब्लॉग पर दे रहे हो!

Monday, 31 August 2009

अच्छाई को उजागर करती है... बुराई!

अच्छाई को उजागर करती है.... बुराई!

ऐसा ही होता आया है और होता भी रहेगा कि 'बुराई अच्छाई को उजागर करती रहेगी !' ...... अब देखिए... अगर अच्छाई को दुनिया के सामने लाना है तो, इसके लिए बुराई की मदद लेनी ही पड़ेगी! ऐसे कई उदाहरण इतिहास में भरे पड़े है,जहाँ अच्छाई के चाँद को रोशनी बिखेरने के लिए काली रात का दामन थामना ही पड़ा है!

...... सर्व मान्य और सर्वत्र प्रचलित 'रामायण' का उदाहरण ही इसके लिए पर्याप्त है!.... अगर रावण बुराई पर न उतर आता तो रामकथा की अहमियत कितनी रह जाती?.......सीता का अपहरण अगर रावण न करता तो राम को लंका की तरफ़ प्रयाण क्यों करना पड़ता?.... राम-रावण युध्ध क्यों होता?.....फ़िर हनुमान से राम का मिलन कैसे होता?.... हनुमान का नाम हम तक कैसे पहुँच पाता?....रावण को युध्ध में राम क्यों परास्त करता?.....रावण राम के हाथों अपनी जान क्यों गंवाता ?......ऐसे कई सवाल जहन में आते है....जब जब 'रामायण'की कथा मैं सुनती हूँ!

..... लगता है कि रावण के बुरे आचरण को ले कर ही 'राम' की मर्यादा पुरुषोत्तम की भव्य और साफ़-सुथरी छबी समाज के सामने आई!...... अन्यथा क्या होता?....राम चौदह बरस का वनवास समाप्त कर के वापस अयोध्या लौट गए होते और अपना राज-पाट संभाल लिया होता....सीता की अग्नि-परीक्षा फ़िर किसलिए होती? .... सीता का त्याग करनेकी भी फ़िर क्या जरुरत पड़ती?.... कौन धोबी ताने मारता कि वह रावण के घर में रहकर आई है?...... लव और कुश भी अयोध्या के सर्व सुविधामय राज-महल में जन्मे होते..... क्या उनका कभी युध्ध में अपने पिता राम से सामना होता?

...... फ़िर रामायण कहीं सिमटकर रह गई होती.....और फ़िर 'राम ' को भगवान मान कर लोग कैसे पुजतें?....कैसे राम-मन्दिर बनतें?.....ऐसे कई राजाओं की कहानियाँ होगी जो सीधे रास्ते पर चलकर खत्म हो गई होगी,और आज हम उनका नाम और अत-पता कुछ भी नहीं जानते!....आगे चलकर क्या हुआ राम के दोनों बेटे लव और कुश का?.... उनसे शायद कोई रावण नहीं टकराया , जिससे कि उसके साथ मुठ--भेड़ करके वे अपने नाम के साथ 'महानता' का दुमछल्ला जोड़ लेते!

....... 'महाभारत ' की कहानी भी कुछ ऐसा ही बयां करती है!.... कौरव अगर चुप-चाप पॉँच पांडवों को पाँच गाँव दे देंते तो हमें पता भी न चलता कि कौन कौरव थे और कौन पांडव थे!.....श्री कृष्ण को करने के लिए फ़िर महान काम कौन सा रह जाता?.....श्री कृष्ण को तब गीता का उपदेश देने की जरुरत भी न पड़ती...यह बात अलग है कि आज हम 'भगवत गीता' जैसे महान ग्रन्थ से वंचित रह जाते .... क्या इसका इसका श्रेय कौरवों को नहीं जाना चाहिए?....क्या उनके बुरे मामाश्री शकुनी को नहीं जाना चाहिए?

....... दशहरे का महान पर्व हम 'बुराई पर अच्छाई की जीत' के प्रतिक स्वरूप मनातें है!.... तो भाई लोगो, ... ज़रा सोचिये, अच्छाई को उजागर करने के लिए भी तो बुराई की जरुरत पड़ती है!.... अंधेरे पर काबू पाने के लिए ही तो 'इलेक्ट्रिसिटी ' की खोज हुई!.... अगर अँधेरा ही न होता तो?....



                                               
सोच कर ही आंखों के आगे अँधेरा छाने लगता है!.... आगे हम लिखें तो क्या लिखें?

Friday, 24 April 2009

राज भाटियाजी...आए और चले भी गए!


राज भाटियाजी..... आए और चले भी गए!



'हरियाणवी ताउनामा '.... ताउजी की अमृत-वाणी का रसास्वादन करने की तो भैया हमें आदत पड़ चुकी है!.... जैसे चाय के बिना दिन शुरू नही होता, वैसे ताऊ-नामे के बगैर ब्लोगिंग में शिरकत करना ना-मुमकिन तो नहीं, पर मुश्किल जरुर हो जाता है!.... क्या कहते हो ताउजी?


...... और फ़िर सभी तो यहाँ अपने है!... हर ब्लॉग की, हर ब्लोगर की अपनी एक अलग पहचान है!... हर ब्लॉग में एक नयापन मौजूद होता है!


..... राज भाटियाजी की हमसे भी सिर्फ़ फोन पर ही बात-चीत हुई। उनकी माताजी की तबियत अचानक ख़राब होने की वजह से वे म्यूनिख से उड़कर भारत आ पहुंचे और सीधे रोहतक चले गए अब उनकी माताजी की तबियत कुछ संभल गई है... उन्होंने यह खुश-ख़बर दी!.... १८ से २४ एप्रिल तक का प्रोग्राम वे बना कर आए थे!.... आज सुबह ९ बजे की लुफ्तांसा की फ्लाईट से म्यूनिख के लिए रवाना हो गए!


..... वे जब दिल्ली आ पहुंचे थे तब ऊहोने आने की सूचना मुजे फोन पर दी थी !.... बाद में मेरे यहाँ २३ एप्रिल के रोज आने का प्रोग्राम भी बनाया था....लेकिन वे २३ एप्रिल के रोज शाम के समय दिल्ली पहुंचे और दूरी की वजह से मेरे घर नहीं पधार सकें!.... उन्होंने फोन पर इत्तिला देते हुए, असमर्थता भी प्रकट की!.... यह सो समझ में आने वाली बात है कि उनके लिए तो अब भारत ही विदेश के समान है!... उनके लिए दिल्ली के रास्तों का सही पता लगाना भी तो भगिरथ कार्य है!.... वे लगभग ३० वर्षों से म्यूनिख (जर्मनी) में रह रहे है!


......... सुबह ८ बजे उन्होंने एयर-पोर्ट से फोन किया ..... और मुझे अपना निमंत्रण याद दिलाया कि 'मैंने उनके यहाँ प्रोग्राम के मुताबिक अवश्य पहुंचना है! '.... मैंने उन्हें ' शुभ-यात्रा' का संदेश दिया!.... समय का अभाव था; ज्यादा बात-चीत सम्भव भी नहीं थी!


...... मैं दिनांक २ मे के रोज लुफ्तांसा एयर-वेज से जर्मनी जा रही हूँ!... मैं अर्लांगन जा रही हूँ; जहाँ मेरा परिवार, मेरे बच्चे रहतें है!... करीबन तीन महीने जर्मनी में रहने का मेरा प्रोग्राम है!.... भाटियाजी के यहाँ मैं आमंत्रित हूँ!.... उनके और मेरे परिवार का परिचय भी तब आपस में होगा!.... ऐसे में लगता है कि दुनिया कितनी छोटी होती जा रही है!


........जर्मनी मै पहली बार जा रही हूं; ....बहुतसी जगहों पर घुमने का प्रोग्राम बना हुआ है!... कुछ समय से व्यस्तता के कारण मैं कुछ लिख नहीं पाई! .... लेकिन अब ऐसा नहीं होगा और बिच बिच में यहाँ अपनी उपस्थिति जरुर दर्ज करवाती रहूंगी!


........ अब भले ही इसे 'बात का बतंगड़ समझा जाए'.... लेकिन आनंद-दायक तो है! ही!

Wednesday, 28 January 2009

तेरे अंगने में... हमारा क्या काम है?

तेरे अंगने में...हमारा क्या काम है?



आज हम बात कर रहे है बच्चनजी की... वही जाने माने अमिताभ बच्चन महानायक, बिग बी, मुकद्दर के सिकंदर औए एक जमाने में तो इन्हे 'सरकारी हीरो' भी कहा जाता था..... क्यों कि इनकी जड़ें पं. जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ जुड़ी हुई थी...आज ये महानायक ख़ुद ही एक असंख्य जड़ों वाला एक वटवृक्ष है



... लेकिन ये ब्लॉग इनकी तारीफ़ में नहीं लिखा जा रहा.... इनकी तारीफ़ तो वैसे भी दुनिया हो ही रही है......... तो बहती गंगा में एक लोटा पानी डालनेकी घृष्टता हम नहीं करेंगे ... ताजा समाचार यह है कि इनकी बहू ऐश्वर्या रोय बच्चन पद्मश्री लेने वालों की कतार में खड़ी है ; पर उसे देख कर हमें कोई आश्चर्य भी नहीं हो रहा... क्यों कि बच्चनजी का नाम जिस किसी के भी साथ जुड़ जाए... वह मनुष्य हर तरह से लायक बन ही जाता है... और बहू तो आख़िर बहू ही... ऐश्वर्या की जगह कोई 'दिनचर्या' नाम की भी इनकी बहू होती तो वह भी... भारी भरखम इनाम की हकदार अपने आप हो ही जाती.... ऐसा हमारा और हम जैसे अकलमंदों का मानना है





... अब अमिताभजी के ब्लॉग की चर्चा भी लगे हाथ होनी जरुरी है... वे ब्लॉग लिखतें है और हम जैसे अक्लमंद पढ़तें है... यह तो सर्व विदित है... लोग कहतें है कि वे अच्छा लिखतें है... हाल ही में उन्हों ने फ़िल्म 'स्लमडोग मिलिओनर ' फ़िल्म के बारे में अपने विचार व्यक्त किए ... हमने यह ख़बर अखबार में पढ़ी....क्यों कि हम बच्चनजी का ब्लॉग नहीं पढ़तें



.... क्या बच्चनजी किसीका ब्लॉग पढ़तें है?... किसीका पढा हो और टिपण्णी लिखी हो तो बताइये... ब्लॉग पढने का सबूत टिपण्णी ही होता है... स्लमडोग मिलिओनर के बारे में तो बहुतसे ब्लोगर्स ने बहुत कुछ लिखा है... सभी की अपनी अपनी अलग राय है... तो क्या और किसीका ब्गोग अमितजी ने नहीं पढा... चलिए किसी विषय पर अमितजी ने कोई ब्लॉग पढा हो और टिपण्णी लिखी हो... क्या ऐसा भी कभी हुआ है?



.... तो फ़िर उनके ब्लॉग पढ़ कर हम टिपण्णी क्यों देते है... इसलिए कि उनके पास टाइम नहीं है और हमारे पास टाइम के अलावा और कुछ नहीं है?..... मैंने कई ब्लॉग पढ़े है,यहाँ प्रतिभाओं की कमी कतई नहीं है बहुत से ब्लोगेर्स है जो सही में प्रतिभावान है.... लेकिन छिपी प्रतिभा भी क्या नवाजी जाती है?...


... और भी कई बड़ी हस्तियाँ .... जैसे कि आमिर खान, अनुपम खेर वगैरा ब्लॉग लिखतें है....अपने लालकृष्ण अडवानी भी खूब लिखतें है.... लेकिन क्या ये हस्तियां किसी और ब्लोगर का ब्लॉग पढ़नेकी बात सामने आई है?... अगर ऐसा है तो टिपण्णी दिखाइयें... हमारे साथ साथ कई ब्लोगर्स को भी बेहद खुशी होगी

पहले फिल्म, फ़िर राजनीति, फ़िर टी वी , फ़िर फ़िल्म और फ़िर अब ब्लॉग.... वाह वाह बच्चनजी! अपने आँगन से बाहर निकल कर किसी और के आँगन में भी तशरीफ़ लाइए.... वरना आपके आँगन में आना ब्लोगेर्स कब बंद कर देंगे.... आपको पता भी नहीं चलेगा