Wednesday, 28 January 2009

तेरे अंगने में... हमारा क्या काम है?

तेरे अंगने में...हमारा क्या काम है?



आज हम बात कर रहे है बच्चनजी की... वही जाने माने अमिताभ बच्चन महानायक, बिग बी, मुकद्दर के सिकंदर औए एक जमाने में तो इन्हे 'सरकारी हीरो' भी कहा जाता था..... क्यों कि इनकी जड़ें पं. जवाहर लाल नेहरू और श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ जुड़ी हुई थी...आज ये महानायक ख़ुद ही एक असंख्य जड़ों वाला एक वटवृक्ष है



... लेकिन ये ब्लॉग इनकी तारीफ़ में नहीं लिखा जा रहा.... इनकी तारीफ़ तो वैसे भी दुनिया हो ही रही है......... तो बहती गंगा में एक लोटा पानी डालनेकी घृष्टता हम नहीं करेंगे ... ताजा समाचार यह है कि इनकी बहू ऐश्वर्या रोय बच्चन पद्मश्री लेने वालों की कतार में खड़ी है ; पर उसे देख कर हमें कोई आश्चर्य भी नहीं हो रहा... क्यों कि बच्चनजी का नाम जिस किसी के भी साथ जुड़ जाए... वह मनुष्य हर तरह से लायक बन ही जाता है... और बहू तो आख़िर बहू ही... ऐश्वर्या की जगह कोई 'दिनचर्या' नाम की भी इनकी बहू होती तो वह भी... भारी भरखम इनाम की हकदार अपने आप हो ही जाती.... ऐसा हमारा और हम जैसे अकलमंदों का मानना है





... अब अमिताभजी के ब्लॉग की चर्चा भी लगे हाथ होनी जरुरी है... वे ब्लॉग लिखतें है और हम जैसे अक्लमंद पढ़तें है... यह तो सर्व विदित है... लोग कहतें है कि वे अच्छा लिखतें है... हाल ही में उन्हों ने फ़िल्म 'स्लमडोग मिलिओनर ' फ़िल्म के बारे में अपने विचार व्यक्त किए ... हमने यह ख़बर अखबार में पढ़ी....क्यों कि हम बच्चनजी का ब्लॉग नहीं पढ़तें



.... क्या बच्चनजी किसीका ब्लॉग पढ़तें है?... किसीका पढा हो और टिपण्णी लिखी हो तो बताइये... ब्लॉग पढने का सबूत टिपण्णी ही होता है... स्लमडोग मिलिओनर के बारे में तो बहुतसे ब्लोगर्स ने बहुत कुछ लिखा है... सभी की अपनी अपनी अलग राय है... तो क्या और किसीका ब्गोग अमितजी ने नहीं पढा... चलिए किसी विषय पर अमितजी ने कोई ब्लॉग पढा हो और टिपण्णी लिखी हो... क्या ऐसा भी कभी हुआ है?



.... तो फ़िर उनके ब्लॉग पढ़ कर हम टिपण्णी क्यों देते है... इसलिए कि उनके पास टाइम नहीं है और हमारे पास टाइम के अलावा और कुछ नहीं है?..... मैंने कई ब्लॉग पढ़े है,यहाँ प्रतिभाओं की कमी कतई नहीं है बहुत से ब्लोगेर्स है जो सही में प्रतिभावान है.... लेकिन छिपी प्रतिभा भी क्या नवाजी जाती है?...


... और भी कई बड़ी हस्तियाँ .... जैसे कि आमिर खान, अनुपम खेर वगैरा ब्लॉग लिखतें है....अपने लालकृष्ण अडवानी भी खूब लिखतें है.... लेकिन क्या ये हस्तियां किसी और ब्लोगर का ब्लॉग पढ़नेकी बात सामने आई है?... अगर ऐसा है तो टिपण्णी दिखाइयें... हमारे साथ साथ कई ब्लोगर्स को भी बेहद खुशी होगी

पहले फिल्म, फ़िर राजनीति, फ़िर टी वी , फ़िर फ़िल्म और फ़िर अब ब्लॉग.... वाह वाह बच्चनजी! अपने आँगन से बाहर निकल कर किसी और के आँगन में भी तशरीफ़ लाइए.... वरना आपके आँगन में आना ब्लोगेर्स कब बंद कर देंगे.... आपको पता भी नहीं चलेगा

Saturday, 17 January 2009

२. इनसे जब हम मिलें...पूज्य श्री सत्यप्रकाश महाराजश्री |

2..पूज्य श्री सत्यप्रकाश महाराजश्री!(हास्य-व्यंग्य)


...महाराजश्री ने अब अपने गले की लगाम ढीली छोड़तें हुए भजन की तरफ रुख किया... घिसी हुई रेकोर्ड की तरह भजन सुनाई दे रहा था... वहां बैठे कुछ लोगों ने महाराजश्री का साथ देते हुए कोरस सोंग की तरह गाना शुरू भी कर दिया... हार्मोनियन और तबले का साथ भी था बड़ा ही भावपूर्ण भजन था

... और भजन गाते गाते महाराजश्री ने राग आलापा...

आज रह गए भैया!...सारे मथुरावासी दंग...
डोल रहा कृष्ण, देखो गोपियों से संग...

लोग पीछे पीछे बोले जा रहे थे... हम कैसे पीछे रहते?... हम आखिर हम जो थे
हम भी आंख मूंद कर बोले..........डोल रहा कृष्ण देखो गोपियों के संग!

महाराजश्री को लगा की लोगों की आवाज धीमी आ रही है... तो अपनी घिसी रेकोर्ड ब्रांड आवाज को उन्होंने और ऊँची कर दी... और भजन की दूसरी लाइन गाते हुए बोले....

' शिंचा! डोल रहा कृष्ण, देखो गोपियों के संग!

... सुन कर हमने मूंदी हुई आंखें खोल दी... 'शिंचा' शब्द कहीं सुना हुआ सा लगा... तो फिर महाराजश्री के दर्शन इससे पहले भी होने घंटी हमारे कानों में क्यों बजने लगी?... महाराजश्री की भेंगी आंखे भी कुछ पुरानी याद ताजा कर रही थी। इसके लिए अपने दिमाग से कोंटेक्ट करना ही हमने ठीक समझा।... जवाब मिल गया और हम खडे हो कर चिल्लाएं...


"... पकडो, पकडो... ये चोर है।...डाकू है।.... कोई सत्यप्रकाश महाराजश्री नहीं है।... चादनी चौक के सेन्ट्रल बैंक की डकैती के डाकूओ में से ये एक है।"


... हमारे चिल्लाने का असर तत्काल हुआ! ...बैठे हुए लोग जल्दी जल्दी खडे होने लग गए। सत्यप्रकाश महाराजश्री पतली गली से भागने की मुद्रा में हरकत करते हुए लोगों को धक्के मारते हुए मंदिर के मुख्य दरवाजे की और प्रस्थान करने लगे.... लेकिन दो हट्टे-कट्टे व्यक्ति आगे बढे और महाराजश्री की धोती पकड ही ली।... अब पूछ्ताछ शुरु हुई.....


.... हमने बताया कि साल भर पहले हुई चांदनी चौक की सेंट्रल बैंक डकैती के समय हम बैक में कैश जमा करवाने गए थे।.... तब दोपहर कोई ग्यारह बजे के समय बैंक में डकैत घुस आए थे।... हवाई फायर कर के उस समय बैंक में मौजूद सभी लोगों को चुप कराया गया था... लेकिन डकैत तो आपस में बोल ही रहे थे..तब एक डकैत बात करते हुए .... दो-तीन बार ' शिंचा'...' शिंचा' बोला था।... हमने उसके ढके हुए चेहरे से झांकती भेंगी आंखें भी देखी थी।... हम बता रहे थे और लोग सुन रहे थे।


... इस बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया और पुलिस भी आ गई.... लेकिन वो कहावत है ना भैया... वो दिन कहां? जब मिया के पांव में जूती हो।'... हमारा हाल भी वही रहा।... मोस्ट वांटेड डकैत पकडा गया।... लेकिन इसका क्रेडिट सत्याप्रकाश महाराजश्री का प्रवचन सुनने आए एक टी वी जर्नालिस्ट ले गया।... उसने हमारी कहानी तोड मरोड कर, अपनी बना कर पेश कर दी।.. हमारा पत्ता साफ हो गया। हमें टी वी में इंटरव्यु और् अखबार में फोटो छपने की उम्मीद थी... लेकिन हम मंदिर जाने तक ही सीमित रह गए।


.... फिर भी उम्मीद कायम है।.... अब घर से बाहर निकल कर कुछ कर गुजरने का भूत जो सिर पर सवार है।... जय हो वृन्दावन बिहारी लाल की।.... जय हो रामचंद्र भगवान की!

Monday, 5 January 2009

१ इनसे जब हम मिलें ..पूज्य श्री सत्य-प्रकाश महाराजश्री!

1 ..पूज्य श्री सत्य-प्रकाश महाराजश्री (हास्य-व्यंग्य)



हमने सोच ही लिया कि .....'समाज में अपनी पहचान बनाने के लिए , हमें घर से बाहर तो निकलना ही पड़ेगा!... अब देखिये तो जरा!... ये जो नेता लोग है, ये क्या करतें है? अगर ये लोग घर में बैठे रहेंगे तो इन्हे कौन पहचानेगा भला?... कोई कुत्ता भी घास डालने इनके दरवाजे पर नहीं आएगा! ... सोरी!... ये तो ज्यादती हो गई!... कुत्ते कभी घास डालने दरवाजे पर नहीं आते! ... तो बात नेता लोगों की चल रही थी ....तो वोट मांगने के लिए ये नेता लोग जब घर से निकलते है ... तो डयूटी पर जाने जाने वाले सिपाही की तरह नहीं, बल्कि भीख मांगने के लिए कटोरा लेकर निकल पड़े भिखारी की याद दिलवातें है!



अरे , अरे! हम नेताओं की बात पता नहीं क्यों छेड़ते है?... हमारी हंमेशा से यह आदत रही है!... हम तो घर से बाहर निकलने की बात कर रहे थे तो नेताजी याद आ गए !... तो हम घर से निकल कर सबसे पहले मन्दिर गए!... जगह अच्छी होती है!..... हमें बचपन से शिक्षा भी यही दी गई थी कि कोई भी काम शुरू करने से पहले भगवान के सामने नत-मस्तक होना बहुत जरुरी होता है!... आपके द्वारा शुरू किया जाने वाला काम शुभ है या नहीं... ये सोचना दूसरे लोगों का काम है ...और आप जो करने जा रहे है, उस काम को डंडे के जोर पर शुभ कहलवाना आपकी अपनी कैपेसिटी पर निर्भर करता है!... नेता बनने के लिए यही कैपेसिटी काम आती है!



आख़िर हमारे अस्तित्व को हमारे सिवाय भी लोग जानें.... यह बहुत जरुरी था! ... देर से सही , हमें अक्कल तो आ ही गई!...उसी समय हमारे दरवाजे की घंटी बजाकर, भरी दोपहर को हमारी नींद में खलल डालने एक नेताजी आ गए ... वो तो हास्य मुद्रा लिए, चमचों से घिरे हुए, हाथ जोड़ कर, देश का भला करने का वादा कर रहे थे !... अपने लिए अदद एक वोट ही तो मांग रहे थे!.... लेकिन हमारी नींद उडा गए! हमारे से वादा लेते गए कि हमारा वोट उनके अलावा कोई नहीं हड़प पाएगा!... हमें उपर से यह जता गए कि 'हम किस खेत की मूली है!'... हमें बुरा तो जरुर लगा , लेकिन नेताजी की हास्य मुद्रा के कम्बल ने तुरन्त-फुरंत .... बुरा लगने की आग को बुझा भी दिया!



...तो अब हमने ठान ही ली कि अब तो घर से बाहर निकल कर ही दम लेंगे... दुनिया को दिखा देंगे की हम किस खेत की मूली है! बहुत सालों से हम 'मामूली' बने बैठे है! अब ऐसा ज्यादा दिन नहीं चलेगा! .... बगैरा बगैरा सोचतें हुए हम सबसे पहले मन्दिर पहुँच गए!... ' जय हो प्रभु! ....नेताओं का ज्यादा सही..हमारा थोड़ा भी भला करेगा... तो भी चल जाएगा प्रभु!



......वहां प्रवचन हो रहा था!... प्रवचनकारी थे 'पूज्य श्री सत्य प्रकाश महाराजश्री !... वैसे तो सभी महाराजश्री 'पूज्य 'होने का दम भर रहे होते है!... क्यों कि हम और हमारी कैटेगरी के,उन्हें पूज्य कहते है!.... हम वहीं पर एक कोना खाली देख कर बैठ गए और प्रवचन सुनने लग गए! ....बीच बीच 'वृन्दावन बिहारी लाल की जय' के साथ साथ 'महाराज श्री सत्यप्रकाशजी की जय' बोलना भी हमारे लिए लाजमी था!


........जारी

Wednesday, 24 December 2008

स्कूल और छुट्टियों का चोली-दामन का साथ

...हाय रे...स्कूल की छुट्टियाँ!(हास्य-व्यंग्य!)



बचपन में जब हम स्कूल में पढ़ा करते थे... तब भी छुट्टियां हमें अच्छी नहीं लगती थी! आज भी अच्छी नहीं लगती!... एक बार पिताजी का तबादला एक छोटेसे गाँव में हुआ था!... पिताजी तो खैर! डॉक्टर थे!... अस्पताल में उनका आना-जाना लगा रहता था;.... लेकिन हम क्या करे?.... हमें तो पढने के लिए स्कूल जाना पड़ता था!...




स्कूल मजेदार था!...उसमें में उतनी ही सुविधाएँ थी; जितनी की छोटेसे गाँव के एक अदद स्कूल में होती है!... धूप की जब बहुतायत होती थी... हमारी क्लास एक घने बरगद के पेड़ के नीचे बैठाई जाती थी... जब ठंड का डंडा लहराता था तब टेंट में सिकुड़कर बैठने की भी सुविधा थी... लेकिन बारिश के मौसम में अक्सर हमें घर जाने के लिए धमकाया जाता था!




....धमकाया इसलिए जाता था, ...क्यों कि हम घर जाने के लिए राजी होते ही नहीं थे!... मास्टरजी से विनती करते थे कि हम पर इतना बड़ा जुल्म ना ढहाया जाये और हमें घर ना भेजा जाये!...हमें स्कूल में ही रहने दीजिए...छुट्टी हमें पसंद नहीं है!... तब स्कूल में पढाने के लिए मास्टरजी ही हुआ करते थे... मैडम का फैशन तो तब मार्किट में नहीं था! .... एक बात हम बताना भूल ही गए कि हमारी क्लास में हमारे समेत तीन लड़कियां और पच्चीस लडके ....जिन्हें विद्यार्थी कहतें है....हुआ करते थे! ..हाँ!..छुट्टी तो किसी को भी पसंद नहीं थी!




...तो हम और हमारे जैसे बहुसंख्य विद्यार्थी घर जाने के लिए राजी नहीं होते थे!... हम तो घर बैठकर होने वाली बोरियत से घबरा जाते थे; जब कि हमारे क्लास-मेट ' घर पर काम करना पडेगा...' की सोच से घबरा कर स्कूल में ही समय गुजारना पसंद करते थे!... कोई गलती से यह न समझ बैठे की हम बहुत ज्यादा पढाकू थे! बारिश के मौसम में, मास्टरजी को घर जाकर मास्टरनी( पत्नी) के हाथ के बने चटपटे पकौडे जो खाने होते थे!... मास्टरजी तो बादल देखकर ही छुट्टी डिक्लेर कर देते थे और सबसे पहले मास्टरजी ही स्कूल से बाहर निकलते थे!...उन्हें छुट्टियों से बड़ा ही लगाव था! 

स्कूल में एक और भी मास्टरजी थे...जो हेड-मास्टर  कहलातें थे!... वे छुट्टी पर ही रहते थे!...उनके दर्शन स्कूल में 26 जनवरी और 15 अगस्त वाले दिन ही होते थे... अन्यथा वे सरपंच होने के नाते, गांववालों में आपसी झगडे करवाने और फ़िर उन्हें निपटाने में लिप्त रहतें थे!... स्कूल में होने वाली धान्दली से उन्हें कोई लेना देना नहीं था!





...तो गाँव के स्कूल के वे सुनहरे दिन याद करके हम आज भी तरोताजा हो लेते है!... शहरों के अंग्रेजी पढाने वाले ,पब्लिक स्कूल वाले विद्यार्थियों की बुरी हालत आज हम देख ही रहे है!... बेचारे छुट्टी के दिन भी 'ट्यूशन' नाम की राक्षसनी के हाथ से बच नहीं सकतें!




.... वैसे छुट्टियों की कमी तो सरकार ने भी कभी होने नहीं दी!... जितनी छुट्टियाँ स्कूलों के लिए बहाल की जाती है, उतनी किसी और डिपार्टमेंट के लिए उपलब्ध होने का रेकोर्ड हमारे पास नहीं है!... अभी दिवाली गई, ये देखो ईद गई...ये दशहरा आया...ये राम जन्म..ये कृष्ण जन्म...ये माता की नवरात्री.. अब क्रिसमस और फ़िर नया साल!...बीच से शनिवार और रविवार भी तो है... अपरंपार छुट्टियाँ !... किसी को भली लगे या बुरी!...हाय रे छुट्टियाँ!



Sunday, 14 December 2008

तारे जमीं पर मेरी नज़र से

तारे जमीं पर... मेरी नज़र से !



हम सभी फिल्में देखतें है!... कोई ज्यादा , तो कोई कम!... देखने का नजरियाँ भी सभी का अलग अलग ही होता है!... तभी तो कोई फ़िल्म किसी एक व्यक्ति को अच्छी लगाती है ; तो दूसरे व्यक्ति को बोर लगती है; तो तीसरे व्यक्ति को सो सो लगती है!.... कुछ फिल्में ऐसी भी होती है जो बच्चों से लेकर बडो तक सभी को पसंद आती है!... ऐसी फिल्में 'सदाबहार ' फिल्में कहलाती है... बार बार देखने पर भी, एक बार और देखने के लिए मन ललचाता है!


ऐसी ही एक फ़िल्म ' तारे जमीं पर...' मैंने देखी! ...हालाकि यह फ़िल्म लगभग एक साल पहले रिलीज हुई है ...तो इसे अब पुरानी भी कह सकतें है... लेकिन मुझे इस फ़िल्म को देखने का मौका अब हाथ लगा!... वैसे मैं फिल्में कम देखती हूँ; लेकिन जब तक नई पेशकश गिनी जाती है तब तक ही देखती हूँ!... बाद में इंटरेस्ट कम हो जाता है!...खैर!


... तो मैंने 'तारे जमीं पर ...' देखी और मुझे लगा कि अगर यह फ़िल्म देखनी रह जाती तो मैं एक अच्छी और अलग किस्म की फ़िल्म देखने से वंचित रह जाती! ... इस फ़िल्म के बारे में मैंने अख़बार और पत्रिकाओं में बहुत कुछ पढा था!... टी.वी.पर बहुत कुछ सुना भी था... सभी ने इस फ़िल्म के बारे में जी भर कर प्रसंसनीय उदगार लिखे और कहे थे!...


... मैंने जब मौका मिला तो फ़िल्म अपनी नज़र से देखी.... इस फ़िल्म के बारे में पढ़ा और सुना हुआ सबकुछ पहले ही अपने दिमाग़ से बाहर निकाल दिया था!... मैंने पूरी फ़िल्म देखी!... और इस नतीजे पर पहुँची की फ़िल्म शिक्षाप्रद है!... असामान्य बुद्धि और चाल-चलन के बच्चो के साथ, माता-पिता और शिक्षकों को किस तरह से पेश आना चाहिए... यही इस फ़िल्म के माध्यम से बताया गया है!... यही सब विस्तार से अनेक लेखकों और पत्रकारों द्बारा फ़िल्म की समीक्षामें लिखा और कहा भी गया है!


अब मैंने एक अलग चीज महसूस की; और देखी कि.... इस फ़िल्म का बाल कलाकार दर्शिल याने कि फ़िल्म का हीरो ईशान अवस्थी, हम सभी के अदंर छिपा हुआ है!... क्या हम भी ईशान की तरह नहीं है?... मिटटी खोदते हुए मजदूर की शर्ट का टूटा हुआ बटन हमारा भी ध्यान खिंचता है!... पैडल रिक्शा-चालक के हाथ की फूली हुई नसे हमारा ध्यान खिंचती है.... भेल-पुरी वाला और बर्फ के गोले बनाने वाले तेजी से चल रहे हाथ हमें भी अच्छे लगते है!.... ऐसी बहुतसी चीजे है, जो हम ईशान की तरह ही उत्सुकता से ताकते रहते है!


.... आमिर खान निशाना साधने में फ़िर एक बार कामियाब हुए है....और इस फ़िल्म को हिट बनाने में यही नुस्खा सबसे ज्यादा काम आया है!... हम ईशान में अपनी छबि देखते है!... मैंने सही कहा या ग़लत?

Sunday, 23 November 2008

वधू चाहियें तो कैसी चाहियें

'वधू चाहिए....' तो कैसी चाहिए?


शादी के 'वधू चाहिए' विज्ञापनों पर आप भी नजर डालते होंगे और मैं भी डालती हूँ.... ऐसे विज्ञापनों से समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ, जीवनसाथी और शादी.कॉम जैसी वेब-साइट्स.... भरे पडे है!.... लड़की कुछ ऐसी चाहिए होती है....सुशील , उच्चशिक्षित, संस्कारी, लम्बी, पतली, बड़ों का आदर करने वाली.... दुनियाभर के सभी अच्छे गुणों से युक्त चाहिए होती है!... एक अहम् बात तो यह कि वैसे साथ साथ कामकाजी हो तो सोने पे सुहागा।!..... वैसे साथ साथ उसका घरेलु होना भी जरुरी है !.... लो ....कर लो बात!....ये तो ऐसा है कि लड़की खुलकर हँसे भी ....लेकिन हंसने की आवाज नहीं आनी चाहिए! लड़की को अपनी बात सामने रखने की पुरी स्वतंत्रता है... लेकिन वह अपना मुंह खोल नहीं सकती!...वह चाहे तो अपनी मरजी से लम्बी दौड़ लगा सकती है.... लेकिन शर्त यह कि वह अपनी जगह से हिल नहीं सकती!


कामकाजी लड़कियों की मांग कुछ ज्यादा ही है!.... वैसे महंगाई के जमाने में ये मांग सही भी है....लेकिन!.... यहाँ भी देखिए कि 'लेकिन' रास्ता रोके खड़ा है !.... अब वर पक्ष का कहना है कि लडकी सुशील होनी चाहिए!... अब लड़की अगर अपने कामकाज के क्षेत्र से जुड़े पुरुषों से हँसी मजाक कर लेती है, या किसी के साथ कभी कहीं आती जाती है तो उसकी सुशीलता पर प्रश्नचिंह लगाने से ससुराल वाले चुकते नहीं है!.... तो विज्ञापन में उसकी कमाई पर नजर क्यों रखतें है?


लड़की का कामकाजी होते हुए भी घरेलु होना जरुरी है.... मतलब कि घर के कामों में दक्ष भी हो और करे भी!... चूल्हा-चौका, ससुरालवालों की सेवा , मेहमानों की आवभगत....इतना सबकुछ संभालकर ही वह कामकाज करें!....इसका क्या मतलब? ....इसका मतलब कि वह घर और बाहर....दोनों क्षेत्रों की जिम्मेदारियां सभालें।...ऐसा क्यों?


क्या आज के युवा इतनी संकुचित मानसिकता से भरपूर है?... अगर नही है, तो 'वधू चाहिए' के ऐसे वाहियात विज्ञापनों पर रोक लगा दें।... और विज्ञापन देने से पहले यह तय कर ले कि वधू कामकाजी चाहिए या घरेलु चाहिए।... दो नावों में पैर रखकर यात्रा करने की तमन्ना रखने वालों का हश्र् क्या होता है.....ये हमें बताने की जरुरत नहीं है। लड़की का सुंदर, सुशिल, संस्कारी वगैरा वगैरा होना क्या होता है.... इसकी व्याख्या पहले तय करें!

Sunday, 16 November 2008

धड़ाम से गिर गया शेर

धड़ाम से गिर गया शेर.... आपने आवाज सुनी?


मैंने तो सुनी! ... इंटरनेशनल धमाका था! ... मुझे लगता है, बहरों को भी सुनाई पड़ा होगा! चारों ओर हाहाकार मच गया!... जैसे सुनामी आ गई; जैसे बम-ब्लास्ट हुआ; जैसे भूचाल आ गया, जैसे डमरुवाले बाबा ने तांडव शुरू किया; जैसे पृथ्वी से मंगल आ कर टकराया!.... कोई कुछ समझ बैठा, तो कोई कुछ!


सुननेमें यह भी आया कि कुछ लोगों को बहुत खुशी हुई.... इसलिए कि उन्होंने शेर मार्किट में टके लगाए नहीं थे!... हो सकता है कि उनके पास लगाने के लिए थे ही नहीं ....लेकिन यह तो अंदर की बात है!.... यह लोग लड्डू-पेढे बाट्तें देखे गए!... दूर क्या जाना.... हमारे पड़ोसी ही -शायद पहली बार - हमारे यहाँ मिठाई का डिब्बा लेकर पधारें!... बहाना तो पप्पू के पास होने का था!.... जब कि हम जानतें है कि पप्पू ने हाल ही में कोई परीक्षा नहीं दी है!


...तो शेर गिर गया !.... कुछ लोगों ने बहती गंगा में नहाना मुनासिब समझा! .....जिन लोगों के 20से 50 हजार रुपये शेरने निगले हुए थे; वे बोल रहे थे कि वे 50लाख गवां बैठे !.... एक शेर मार्किट के पुराने खिलाडी .... जिनको हम जानतें है और मानतें है कि .... उनके 20लाख जरुर शेर निगल गया होगा!.... वे लोगों को कहतें फ़िर रहे है कि उन्हें 2 करोड़ का फटका लगा!....अब ऐसे में कई लोग अपने आप को मालदार साबित करने में लगे हुए है ; तो हम क्या करें?


... कुछ कमजोर दिल के लोग .... इतना बड़ा हादसा सहन नहीं कर पाने की वजह से बेहाल हो गए और समाज से कटकर रह गए है!.... कुछेक लोगों की आत्महत्या करने की खबरें भी आ रही है... उनके लिए हमें बेहद अफसोस है!.... काश कि वे इतना बड़ा कदम न उठातें!


... यह तो इंटरनेशनल धमाका है.... शेर के गिरने से जंगल में ....याने कि मार्किट में ..... हायतौबा मची हुई है!... सभी उद्योग-धंदों पर मंदी के बादल छाये हुए है!.... हमें तो दुःख इस बात का है कि .... टी.वी। पर से विज्ञापनों की भीड़ छट गई है!


... तो देखा?...शेर ने गिरकर भी हमारा कुछ नहीं बिगाडा,... फ़िर भी हम कितने दुखी है?....उम्मीद पर दुनिया कायम है!.... हम उम्मीद करतें है कि शेर फ़िर से पेड़ की चोटी पर नजर आए!