Saturday, 17 January 2009

२. इनसे जब हम मिलें...पूज्य श्री सत्यप्रकाश महाराजश्री |

2..पूज्य श्री सत्यप्रकाश महाराजश्री!(हास्य-व्यंग्य)


...महाराजश्री ने अब अपने गले की लगाम ढीली छोड़तें हुए भजन की तरफ रुख किया... घिसी हुई रेकोर्ड की तरह भजन सुनाई दे रहा था... वहां बैठे कुछ लोगों ने महाराजश्री का साथ देते हुए कोरस सोंग की तरह गाना शुरू भी कर दिया... हार्मोनियन और तबले का साथ भी था बड़ा ही भावपूर्ण भजन था

... और भजन गाते गाते महाराजश्री ने राग आलापा...

आज रह गए भैया!...सारे मथुरावासी दंग...
डोल रहा कृष्ण, देखो गोपियों से संग...

लोग पीछे पीछे बोले जा रहे थे... हम कैसे पीछे रहते?... हम आखिर हम जो थे
हम भी आंख मूंद कर बोले..........डोल रहा कृष्ण देखो गोपियों के संग!

महाराजश्री को लगा की लोगों की आवाज धीमी आ रही है... तो अपनी घिसी रेकोर्ड ब्रांड आवाज को उन्होंने और ऊँची कर दी... और भजन की दूसरी लाइन गाते हुए बोले....

' शिंचा! डोल रहा कृष्ण, देखो गोपियों के संग!

... सुन कर हमने मूंदी हुई आंखें खोल दी... 'शिंचा' शब्द कहीं सुना हुआ सा लगा... तो फिर महाराजश्री के दर्शन इससे पहले भी होने घंटी हमारे कानों में क्यों बजने लगी?... महाराजश्री की भेंगी आंखे भी कुछ पुरानी याद ताजा कर रही थी। इसके लिए अपने दिमाग से कोंटेक्ट करना ही हमने ठीक समझा।... जवाब मिल गया और हम खडे हो कर चिल्लाएं...


"... पकडो, पकडो... ये चोर है।...डाकू है।.... कोई सत्यप्रकाश महाराजश्री नहीं है।... चादनी चौक के सेन्ट्रल बैंक की डकैती के डाकूओ में से ये एक है।"


... हमारे चिल्लाने का असर तत्काल हुआ! ...बैठे हुए लोग जल्दी जल्दी खडे होने लग गए। सत्यप्रकाश महाराजश्री पतली गली से भागने की मुद्रा में हरकत करते हुए लोगों को धक्के मारते हुए मंदिर के मुख्य दरवाजे की और प्रस्थान करने लगे.... लेकिन दो हट्टे-कट्टे व्यक्ति आगे बढे और महाराजश्री की धोती पकड ही ली।... अब पूछ्ताछ शुरु हुई.....


.... हमने बताया कि साल भर पहले हुई चांदनी चौक की सेंट्रल बैंक डकैती के समय हम बैक में कैश जमा करवाने गए थे।.... तब दोपहर कोई ग्यारह बजे के समय बैंक में डकैत घुस आए थे।... हवाई फायर कर के उस समय बैंक में मौजूद सभी लोगों को चुप कराया गया था... लेकिन डकैत तो आपस में बोल ही रहे थे..तब एक डकैत बात करते हुए .... दो-तीन बार ' शिंचा'...' शिंचा' बोला था।... हमने उसके ढके हुए चेहरे से झांकती भेंगी आंखें भी देखी थी।... हम बता रहे थे और लोग सुन रहे थे।


... इस बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया और पुलिस भी आ गई.... लेकिन वो कहावत है ना भैया... वो दिन कहां? जब मिया के पांव में जूती हो।'... हमारा हाल भी वही रहा।... मोस्ट वांटेड डकैत पकडा गया।... लेकिन इसका क्रेडिट सत्याप्रकाश महाराजश्री का प्रवचन सुनने आए एक टी वी जर्नालिस्ट ले गया।... उसने हमारी कहानी तोड मरोड कर, अपनी बना कर पेश कर दी।.. हमारा पत्ता साफ हो गया। हमें टी वी में इंटरव्यु और् अखबार में फोटो छपने की उम्मीद थी... लेकिन हम मंदिर जाने तक ही सीमित रह गए।


.... फिर भी उम्मीद कायम है।.... अब घर से बाहर निकल कर कुछ कर गुजरने का भूत जो सिर पर सवार है।... जय हो वृन्दावन बिहारी लाल की।.... जय हो रामचंद्र भगवान की!

9 comments:

Nirmla Kapila said...

वाह-- वाह अच्छा बतंगड है

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह वाह चुटीली किंतु सार्थक बात आपको बधाई

Udan Tashtari said...

जय हो हरियाणे वाले गपोडी ताऊजी की।

-यहाँ तो हम भी जयकारे में शामिल हैं. :)

राज भाटिय़ा said...

शिंचा!शिंचा! शिंचा! अरे आखिर पकडवा ही दिया न इस बाबा को काश भारत के सभी शिंचा! शिंचा! रुपी बाबा जल्द जेल मै जाये...
हम भी आप के साथ जयकारे मै बढ चढ कर हिस्सा लेगे जी,

विनय said...

बहुत बढ़िया चुटकी है...

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

Abhishek said...

आपने तो बाबाजी को चांदनी चौक से चाइना ही पहुँचा दिया. बधाई हो.

डॉ .अनुराग said...

नजरे भी कमाल है ओर याददाश्त भी....

ilesh said...

hahahaa....simply gr8 ji...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अरे आपने तो वाकई बात का बतंगड़ बना दिया. शिन्चा, मज़ा आ गया!