Monday, 4 April 2011

...स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों की कहानी?

एक सीरियल'..ना आना इस देश मेरी लाडो!'



... सीरियल का नाम है..'ना आना इस देश मेरी लाडो..' ...जो मैं लगभग देढ साल से देख रही हूं!...क्या खूब नाम चुन कर रखा गया है सीरियल का!...कलर्स चैनल पर प्रतिदिन रात साढ़े दस बजे प्रसारित हो रहा है...शनीवार और रविवार अवकाश रहता है!


....इस सीरियल की शुरुआत में ही लिखा हुआ आता है कि यह किसी ख़ास परिवेश, धर्मं या जाति से संबंधित नहीं है ..इसमें स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों को ही दिखाया जा रहा है...वगैरा, वगैरा!


....जब से मैं देख रही रही हूं...इस सीरियल की कहानी एक 'भगवानी ' नाम की एक 'जालिम' महिला के इर्द-गिर्द ही घूम रही है!..विधवा है...पैसेवाली है,....यह अम्माजी के नाम से सर्वत्र जानी जाती है!....इसके तीन बेटे है...तीन बहुएं भी है!...नौकर, चाकर, देवर देवरानी और उनका बेटा और बेटी भी है!...भरा पूरा परिवार है!


....यही अम्माजी औरतों पर पूरजोर अत्याचार किए जा रही है!


...बहूएँ तो इसके नाम से कांप उठती है!...देवरानी की बेटी को घर में नौकरानी बना कर रखा हुआ है ..क्यों कि वह स्त्री है !..सबसे छोटे बेटे राघव की पत्नी सिया नई विचार धारा की है...सिया और राघव का प्रेम-विवाह है!...अम्माजी से वही सबसे ज्यादा प्रताड़ित होती दिखाई है!..घर में उसका बहुत बुरा हाल है!


...कहानी आगे बढ़ती है ...अम्माजी, देवरानी की बेटी की और उसकी सहेली की इसलिए हत्या करवाती है...क्यों कि वे दोनों सगोत्र के लड़कों से शादी करना चाहती थी!..लडकों की भी अम्माजी हत्या करवा देती है...कहानी की कमजोरी तो देखिए कि अम्माजी पर कोर्ट में केस भी चलता है पर वह निर्दोष छूट जाती है!


...आगे चल कर पता चलता है कि अम्माजी ने अपनी बेटी पैदा होने पर उसका त्याग कर दिया था...वही बेटी डाकू 'अंबा' बन कर अम्माजी से टक्कर लेती है...वाह भाई वाह!....इस समय अच्छा लगता है कि अम्माजी को मात मिलने वाली है...लेकिन अफ़सोस कि नहीं मिलती!...


.....अम्माजी की बहू 'सिया' जब जुडवा बेटियों को जन्म देती है..तब अम्माजी उन बेटियों को जान से मार डालने के लिए कई हथकंडे अपनाती है...लेकिन कामियाब नहीं होती!...न हुई तो क्या हुआ?....बेटियों को बचाने की कोशिश में बहू' सिया' मृत्यु के मुख में चली जाती है!...और अपनी पत्नी और बेटियों को बचाने वाला अम्माजी का बेटा राघव भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता है...खैर ..दोनों बेटियां बच जाती है! ...एक बेटी 'दीया'अम्माजी के यहां पल रही है और दूसरी बेटी' जिया' अंबा पाल रही है!


....समय आगे बढ़ता है..अम्माजी अब गांव से दिल्ली आ चुकी है...यहां भी ठाठबाठ से रह रही है...कमाई का जरिया तो बेईमानी ही है!...अम्माजी की बेटी अंबा भी अब डकैती का काम छोड़ कर दिल्ली आ कर बस गई है!..वह शादियों के प्रबंधन का काम कर रही है!...इसकी भी कमाई अच्छी हो रही है!..अम्माजी और अंबा ..एक दूसरी के बारे में कुछ भी जानती नहीं है!..कहानी को आगे बढाने के लिए यह भी जरुरी था!


....अम्माजी के बेटे गलत काम में शुरू से ही साथ देते आए है...बेटा गजेन्द्र और जोगेंद्र अम्माजी के कहने पर और अपनी इच्छा से भी कई हत्याए कर चुके है ...नौकर 'यशपाल' भी खूंखार भेड़िए जैसा है...यह अम्माजी के इशारों पर अब तक कई खून कर चुका है...क़ानून की गिरफ्त में अब तक अम्माजी का कोई भी मोहरा नहीं फंसा है.... कहानी लेखक को बधाई!


...इधर अम्माजी के बेटे गजेन्द्र के बेटे ..याने कि अम्माजी के पोते की शादी अमेरिका निवासी लडकी से होने जा रही है...लेकिन अम्माजी की मरजी के खिलाफ कैसे हो सकती है?..अम्माजी बहुत अकलमंद तो है ही ...अब तक तो अक्ल का इस्तेमाल करके ही सैकड़ों अपराध कर चुकी है!...वह ऐसी चाल चलती है कि लडकी ही ऐन शादी के फेरों के समय शादी करने से इनकार कर देती है और अमेरिका वापस चली जाती है!...अम्माजी जो चाहती थी वही होता है!...लेखक को फिर एक बार बधाई देने का मन कर रहा है!..जय हो अम्माजी की!


...लेकिन शादी का प्रबंधन संजोग से ( ...ऐसे संजोग तो कहानियों में आते ही है ) अंबा के हाथ में है...इस वजह से अंबा के घर पल रही राघव और सिया की बेटी 'जिया ' इस शादी में उपस्थित है...वैसे भी वह अपनी जुडवा बहन 'दीया' की सहेली भी है...दोनों एक ही कोलेज और कक्षा में पढ़ रही है!...लेकिन असलियत जानती नहीं है!


....शादी के प्रबंधन के लिए एक युवा लडकी 'नेहा' भी कार्यभार संभाल रही है!..उस पर अम्म्माजी के पोते यानी कि देवर के बेटे की बुरी नजर है


...कहानी में अब गांठे लगाने का काम लेखक ने आरंभ कर दिया है!... .


..तो होता यह पोता 'नेहा' को बस में करने कि कोशिश करता है...लेकिन उसके हाथो इस बुरे काम को अंजाम देते वक्त 'नेहा' कि ह्त्या हो जाती है!...अम्माजी अब पोते को कानूनी शिकंजे से बचाने के दावपेच खेलती है!....देवर का बेटा हुआ तो क्या हुआ...उसका पुरुष होना और अम्माजी के खानदान से होना ही काफी है!....'दिया' ने खून होते हुए अपनी आँखों से देखा है.. तो इस दरमियान 'दिया' की गवाही अहम् होती है!...लेकिन दिया को कोर्ट जाने से रोकने के लिए अम्माजी गुंडे -बदमाश भेजती है !


...बहुत लड़ाई झगड़े और खून खराबा इस समय दिखाया गया है....और दिया को बचाते हुए अम्माजी की बेटी 'अंबा' जान गवां बैठती है!...बहुत ही दारुण प्रसंग दिखाया गया है!


....यह है इस सीरियल की अबतक की कहानी!...स्त्रियों पर होने वाला अत्याचारों की पराकाष्ठा जरुर दिखाई गई है...लेकिन क्या सही में हमारा समाज ऐसा है?.....क्या अम्माजी जैसी स्त्रियों का समाज में अस्तित्व है?...अगर अपराधी प्रवृत्ति की स्त्रिया हमारे समाज में है, तो क्या क़ानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता?....क्या इस सीरियल को दिखा कर लेखक और टी.वी. चैनल वाले यही कहना चाहते है कि यह सब हंमेशा के लिए ऐसे ही चलता रहेगा? ...इसमे कभी कोई बदलाव आएगा ही नहीं?


...अगर आगे की कहानी में भी अम्माजी कत्लेआम करती ही जाएगी तो औरतों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों को दिखाने की क्या जरुरत है?


...सीरियल के सभी कलाकार अपनी अपनी भूमिका के लिए अच्छे है!


.....महेन्द्र सिंह धोनी की क्रिकेट टीम ,भारत का दुनिया में डंका बजा चुकी है...क्रिकेट का 'वर्ल्ड कप ' हमारा हो चुका है!...चारों तरफ खुशियों के परचम लहरा रहे है....ऐसे में नया संवत्सर अपने पावन कदम रख चुका है!...सभी को नवरात्री की ढेरों शुभ-कामनाएं!

5 comments:

अन्तर सोहिल said...

वाह!
आपने तो पूरा डेढ साल की सीरियल ही सुना डाला, अच्छा लगा।
कहानी की नायिका और खलनायिका भी अकेली अम्मा जी है। अगर उसे निकाल दिया जाये तो सीरियल खत्म।
परिवार के सभी सदस्यों में भगवानी की दहशत है।

प्रणाम स्वीकार करें

shikha varshney said...

इन टी आर पी बढ़ाने वाले सीरियलों का असलियत से शायद ही कोई लेना देना होता हो ..हमें तो बेबकूफी भरा ड्रामा से ज्यादा कुछ नहीं लगते.

नरेश सिह राठौड़ said...

मै और मेरा परिवार कोइ भी धारावाहिक नहीं देखते देखते है | कुछ दशक पहले धारावाहिको को निश्चित कड़ी में निपटाना होता था उनकी एक कहानी भी होती थी | लेकिन आजकल वस्तु स्थति बदल गयी है | ना कहानी का सर पैर होता है ना ही कहानी का अंत |जब तक आपके धारावाहिक द्वारा साबुन तेल बेचे जा सकते है तब तक आप चला सकते है |

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

इस तरह के किरदार आम जीवन में कहाँ मिलते हैं..... यह सब बात का बतंगड़ जैसा ही लगता है....आपने बहुत सटीक विचार रखे हैं..... शुभकामनाएं

ZEAL said...

कभी सीरियल नहीं देखती इसलिए जानकारी नहीं है , लेकिन आपकी विवेचना से पूर्णतः सहमत हूँ।