Monday, 10 November 2008

चीनी के बदले नमक

'चीनी कम' देखी और हमारा माथा ठनका....


फ़िल्म 'चीनी कम ' नई रिलीज हुई फ़िल्म नहीं है... लेकिन किसी न कीसी वजह से हमारा देखना रह जाता था... इस फ़िल्म के बारे में भी बहुत से लोगों से बहुत कुछ सुना था!.... कल हमारा इन्टरनेट काम नहीं कर रहा था... सो हम टी.वी की तरफ मुड़ गए... चैनल, एक के बाद दूसरा बदलते बदलते हम 'चीनी कम ' फ़िल्म पर रुक गए और पुरी फ़िल्म आराम से देख डाली


... अमिताभ बच्चन और तब्बू की प्रेम कहानी है... लेकिन उम्रका फासला देखा तो , पहले हम समझ ही नहीं पाए कि इस फ़िल्म से कौन सी शिक्षा समाज को दी जा रही है?...चलो शिक्षा न सही; मनोरंजन का उद्देश्य भी यहां नजर नहीं आया... पिछले पोस्ट में हमने 'दूसरी औरत की वजह से उठती समस्या ' पर सवाल उठाया था; ( एक ब्लॉगर साहब ने इस पर बवाल भी उठाया।)..................लेकिन इस फ़िल्म में प्रणय त्रिकोण भी नहीं था!... हीरो और हिरोइन का ही बोलबाला था!... कहानी लन्दन में घटित हो रही थी.... जैसे कि विदेशी प्रृष्ठभूमि का आंचल हर फिल्म में थामा जाता है।

... 64 साल के बच्चन और 34 साल की तब्बू का मिलाना-जुलना, दोनों के बीच प्यार का पनपना और शादी के मंडप तक पहुंचना... शादी भी कर लेना और सुखी वैवाहिक जीवन का आनद भी उठाना.... यह सब एक फ़िल्म में ही हो सकता है... फ़िल्म के बाहर नहीं


.... अमिताभ बच्चन का एक कैंसर पीड़ित बच्ची से मित्रता, हमदर्दी और लगाव .... कहानी का यह हिस्सा ह्रदय को छू लेता है.... तब्बू के साथ रोमांस करना, तब्बू के पिता परेश रावल के विरोध की परवा न करना, अंत में अपनी मनमानी करते हुए शादी कर लेना... समाज को यह फ़िल्म कौनसी दिशा में ले जाना चाहती है?


... कुछ दशकों पहले, समाज में इसी बात का विरोध चलता आ रहा था.... 'बड़ी उम्र के पुरूष अपने से बहुत छोटी उम्र की लड़कियों से शादी न करें, इसके लिए लोगों को समझाया जा रहा था... लोग समझ भी चुके थे; ऐसी शादियाँ होनी लगभग बंद भी हो चुकी थी... तो फ़िर पानी का बहाव ये फ़िल्म वाले, उलटी दिशामें क्यों मोड़ना चाहते है?... क्या फिल्मों के लिए कहानियों का अकाल पड़ गया है, जो ऐसी कहानियाँ लिखी जा रही है? ....ऐसी कहानियाँ जो समाज की मानसिकता को बिगाड़ कर रख दें?


माना कि अमिताभ बच्चन और तब्बू मंजे हुए कलाकर है; लेकिन इनकी कला का इस्तेमाल समाज को सही दिशा में मोडने के लिए होना चाहिए... न कि गलत दिशा में मोडने के लिए।

4 comments:

Udan Tashtari said...

फिल्मों को इतना सिरियसली न लें. मात्र मनोरंजन का साधन मानें.

Aruna Kapoor said...

हमारे समाज का एक वर्ग ऐसा भी है साहब, जो फिल्मों को सिर्फ मनोरंजन का साधन न मान कर्... अनुकरण करने पर उतर आता है।... कई अपराध, फिल्मों से प्रेरित होकर किए जाने की बातें भी सामने आई है।...ऐसे में फिल्ममेकर की यह सामाजिक जिम्मेदारी है कि फिल्म द्वारा समाज में गलत शिक्षा प्रसारित ना हो।... मेरे ब्लॉग पर उपस्थिति के लिए धन्यवाद।

राज भाटिय़ा said...

पहले फ़िल्मे बनती थी घर को बनने बाली, आज बनती है घर उजाडने वाली, अगर मनोरंजन के साथ साथ बरवादी आये तो ऎसी फ़िल्मो को कुडॆ के डिब्बे मै फ़ेक दो, क्योकि बच्चे तो जो भी फ़िल्म मै देखते है बही करते है. आज कल बकवास ज्यादा बिकता है, आप के लेख से सहमत हू, हम वेसे भी साल मै एक आध ही फ़िल्म देखते है, ओर वो भी बीच मै बन्द करनी पडती है, इन की बेहुदगी देख कर.
धन्यवाद

अभिषेक मिश्र said...

सही कहा आपने की अच्छे कलाकारों की प्रतिभा का इस्तेमाल समाज को सही दिशा दिखने में होना चाहिए. स्वागत अपनी विरासत को समर्पित मेरे ब्लॉग पर भी.